
Supreme Court Emergency Hearing: अगर किसी व्यक्ति की जान या आजादी पर अचानक खतरा आ जाए और कोर्ट का समय खत्म हो चुका हो, तो क्या उसे अगली सुबह तक इंतजार करना चाहिए? इसी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार शुरू किया है। सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट्स को नोटिस जारी कर पूछा है कि क्या ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिससे जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Life and Liberty) से जुड़े बेहद जरूरी मामलों की सुनवाई कोर्ट का नियमित समय खत्म होने के बाद भी की जा सके। अदालत ने साफ कहा कि अगर ऐसी व्यवस्था बनाई जाती है तो उसका फायदा सिर्फ उन्हीं मामलों को मिलना चाहिए, जहां किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार, जीवन या आजादी पर तत्काल खतरा हो।
यह मामला एडवोकेट महेरविश रेन की ओर से दायर जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान सामने आया। CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सभी हाई कोर्ट्स से इस प्रस्ताव पर सुझाव मांगे हैं। कोर्ट जानना चाहता है कि क्या पूरे देश में एक जैसी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाई जा सकती है, ताकि आपातकालीन मामलों में तुरंत सुनवाई संभव हो सके। पीठ ने कहा कि यह मामला लोगों को समय पर न्याय दिलाने से जुड़ा है, इसलिए इसका व्यावहारिक समाधान तलाशना जरूरी है।
याचिका में कहा गया है कि कई बार देर रात गिरफ्तारी, सुबह-सुबह बुलडोजर कार्रवाई, वीकेंड या सरकारी छुट्टी के दौरान सरकारी कार्रवाई या अचानक डिपोर्टेशन जैसे मामलों में लोगों को तुरंत अदालत की जरूरत पड़ती है। लेकिन मौजूदा व्यवस्था में अदालतों तक पहुंच आमतौर पर सिर्फ तय समय, दिन और सीमित वेकेशन बेंच तक ही रहती है। ऐसे में कई बार जरूरतमंद लोगों को समय पर राहत नहीं मिल पाती।
याचिका में मांग-
सुनवाई के दौरान एडवोकेट महेरविश रेन ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में अगर कोई बेहद जरूरी याचिका शाम 6 बजे के बाद दाखिल होती है, तो उसकी सुनवाई के लिए अगली सुबह तक इंतजार करना पड़ता है। उन्होंने अदालत से कहा, अगर मैं शाम 6 बजे के बाद कोई जरूरी याचिका दाखिल करती हूं, तो अगले दिन सुबह मेरा क्लर्क रजिस्ट्री के सामने जाकर उसकी अर्जेंसी बताता है। लेकिन सोचिए उस व्यक्ति के बारे में जिसकी जान या आजादी दांव पर लगी हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में तुरंत न्यायिक राहत देने की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि अगर 24 घंटे सुनवाई की व्यवस्था बनाई जाती है तो यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका इस्तेमाल सिर्फ वास्तविक आपात मामलों में ही हो। गैर-जरूरी मामलों में इस व्यवस्था का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना होगी कि कौन-सा मामला जरूरी है कि उसकी सुनवाई कोर्ट के नियमित समय के बाहर की जाए। उन्होंने कहा, अगर कोई रात 11 बजे याचिका दाखिल करे और अगली सुबह 9 बजे सुनवाई चाहता हो, तो क्या आधी रात को बेंच बैठेगी? सबसे मुश्किल काम अर्जेंसी तय करना है। इसे प्रशासनिक स्तर पर बेहतर तरीके से संभालना होगा।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि अगर भविष्य में ऐसी व्यवस्था लागू होती है, तो उसका दायरा सिर्फ जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों तक ही सीमित रहेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोर्ट के सामान्य समय के बाद सुनवाई का उद्देश्य केवल उन लोगों को तत्काल राहत देना होगा, जिनके मौलिक अधिकारों पर तत्काल खतरा हो।