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सुप्रीम कोर्ट की भी नहीं सुन रही सरकार! नौ साल में तिगुना बढ़ा प्रत्येक भारतीय का कर्ज

सुप्रीम कोर्ट ने 'रेवड़ी कल्चर' के खिलाफ 2022 में भी कदम उठाने को कहा था। अब फिर पूछा है- ये कौन सी संस्कृति है?

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'रेवड़ी कल्चर' को सुप्रीम कोर्ट पहले भी समस्या बता चुका है और इसके समाधान के लिए कह चुका है। (फोटो एआई से बना)

जनता को नकद या मुफ्त की सुविधाएं देने के बढ़ते सरकारी चलन पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं। बीते कुछ सालों में देश भर में यह चलन बढ़ा है। चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो। सत्ताधारी दल इसे 'जन कल्याणकारी योजना' बताते हैं, जबकि विपक्षी पार्टियां ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ कह कर आलोचना करती हैं। केंद्र में बतौर विपक्षी पार्टी आलोचना करने वाली कांग्रेस अपनी सत्ता वाले राज्यों में खुल कर 'रेवड़ियां' बांटती है। उसी तरह केंद्र में खुल कर यह काम करने वाली भाजपा, राज्यों में कांग्रेस व अन्य पार्टियों का इसके लिए विरोध करती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला कदम है और इस पर नए सिरे से विचार की जरूरत है।कोर्ट ने कहा कि आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा कि बिना कुछ सोच-विचार के हम जनता का पैसा इस तरह बांटते रहेंगे? वंचित वर्ग को लाभ देना तो समझा जा सकता है, पर कौन सक्षम है और कौन नहीं, यह तय किए बिना अगर सभी को लाभ दिया जाने लगे तो यह तुष्टीकरण की नीति नहीं कहलाएगी? पूरे देश में यही हो रहा है। हमें तो कभी-कभी बड़ी चिंता होती है।

विशेषज्ञ भी दे चुके हैं चेतावनी

यह बात विशेषज्ञ भी मानते हैं और नेता भी जानते हैं। फिर भी सरकारें इसे कम करने के उपाय आजमाने के बजाय मुफ्त की मदद के नाम पर बढ़ावा ही दिए जा रही हैं।

बीते नौ साल में प्रति व्यक्ति कर्ज तीन गुना बढ़ गया है। इसका एक बड़ा कारण केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा जनता को खुले आम 'रेवड़ियां' बांटना भी है।

वित्त वर्ष (FY)कुल सार्वजनिक कर्ज (अनुमानित ₹ लाख करोड़)भारत की जनसंख्या (करोड़ में)प्रति व्यक्ति कर्ज (₹ में)
2016-17~₹82132₹62,121
2018-19~₹105135₹77,777
2020-21~₹150138₹1,08,695
2022-23~₹205141₹1,45,390
2024-25~₹248144₹1,72,222
2025-26 (Est.)~₹270145₹1,86,206

कर्ज-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP Ratio भी 2016 में यह लगभग 67% था, जो 2021 में बढ़कर 89% तक पहुंच गया था। अब 80-82% के बीच रह रहा है।

सरकार का तर्क है कि कर्ज बुनियादी ढांचा विकसित करने (सड़कें, रेलवे और पोर्ट्स बनाने) के लिए लिया गया है , लेकिन कई अर्थशास्त्री इसकी एक वजह 'रेवड़ी संस्कृति' (Freebies) और सब्सिडी के बढ़ते बोझ को मानते हैं।

अरविंद पनगरिया (16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष) भी इसे समस्या बता चुके हैं और कह चुके हैं कि 16वां वित्त आयोग इसका समाधान सुझाएगा। लेकिन, समस्या बढ़ती ही जा रही है।

15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह ने भी 2022 में एक कार्यक्रम में कहा था कि ये मुफ्त की सहायता कोई समृद्धि के द्वार नहीं खोलती, बल्कि यह वित्तीय त्रासदी की गारंटी है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी कोई पहली बार इस समस्या को नहीं उठाया है। 2022 में भी कोर्ट ने कुछ ऐसा ही कहा था। तब सुप्रीम कोर्ट ने नीति आयोग, वित्त आयोग, विधि आयोग, रिजर्व बैंक, सत्ताधारी और विपक्षी दल, सबसे इस बारे में सलाह देने के लिए कहा था कि चुनावों से पहले राजनीतिक पार्टियों द्वारा 'रेवड़ियां' बांटने की बीमारी का क्या इलाज किया जाए। लेकिन, इलाज निकालने के बजाय मर्ज बढ़ता ही जा रहा है।

क्यों खतरनाक है कर्ज का मर्ज

पैसा अगर और पैसा बनाने के काम में नहीं लगे तो उसका फायदा नहीं होता। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि 80 करोड़ लोगों को हर महीने मुफ्त अनाज देने पर किए गए खर्च का कोई फायदा नहीं, उल्टा नुकसान है। और, ऐसे खर्चों के लिए अगर कर्ज लेना पड़े तो वह करेले पर नीम जैसा हो जाता है।

भारत सरकार कुल राजस्व (Income) का लगभग 25-30% हिस्सा केवल कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च कर देती है। इसके बाद 'रेवड़ियों' के खर्चे! फिर अस्पताल, रेलवे, स्कूलों और विकास के अन्य काम के लिए कम पैसे बचते हैं। साथ ही, कर्ज ज्यादा हो तो अक्सर बाजार में मुद्रा आपूर्ति प्रभावित होती है, जिससे दीर्घकालिक महंगाई का खतरा रहता है।

राज्यों में भी यही गणित काम करता है।

कुछ राज्यों में प्रति व्यक्ति कर्ज का आंकड़ा

राज्यप्रति व्यक्ति कर्ज (अनुमानित)
पंजाब~₹1,02,000 (केवल राज्य का कर्ज)
हिमाचल प्रदेश~₹1,05,000
केरल~₹1,10,000
हरियाणा~₹85,000

भारत का सरकारी कर्ज 270 लाख करोड़ के करीब है। इसमें 85-90 लाख करोड़ राज्य सरकारों का कर्ज है। कुछ राज्यों में मुफ्त वाली किस योजना पर राजस्व का बड़ा हिस्सा खर्च किया जा रहा है, यह इस चार्ट में देखा जा सकता है:

राज्यप्रमुख योजनालाभार्थीवार्षिक अनुमानित खर्चवित्तीय स्थिति (Debt-to-GSDP Ratio)
पंजाबमुफ्त बिजली (300 यूनिट/माह)~90% घरेलू उपभोक्ता~₹20,000 करोड़~46% (सर्वाधिक कर्ज)
राजस्थानमुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना (मुफ्त इलाज)समस्त निवासी~₹4,500 करोड़~38%
दिल्लीमुफ्त बिजली और बस यात्रामध्यम एवं निम्न आय वर्ग~₹4,000 करोड़~18% (संतुलित)
तेलंगानारायथु बंधु (किसान निवेश सहायता)~70 लाख किसान~₹15,000 करोड़~28%
पश्चिम बंगाललक्ष्मी भंडार (नकद सहायता)~2.1 करोड़ महिलाएं~₹12,000 करोड़~37%
उत्तर प्रदेशमुफ्त राशन और उज्ज्वला (होली-दिवाली सिलेंडर)~15 करोड़ लाभार्थी~₹10,000+ करोड़~32%
आंध्र प्रदेशजगनन्ना विद्या देवेना (फीस प्रतिपूर्ति)छात्र एवं परिवार~₹7,000 करोड़~33%
राज्यमुख्य खर्च (Freebies)राजस्व का हिस्सा (%)कर्ज की स्थिति (Debt-to-GSDP)
पंजाबमुफ्त बिजली (300 यूनिट), कृषि सब्सिडी~15-18%46.8% (खतरे के निशान से ऊपर)
हिमाचल प्रदेशOPS (पेंशन), ₹1500 नकद योजना~12-14%42.5% (गंभीर संकट)
कर्नाटकगृह लक्ष्मी, मुफ्त बस यात्रा~10-12%22.6% (कर्ज कम, पर राजस्व घाटा बढ़ा)
छत्तीसगढ़धान पर बोनस, नकद सहायता~14%26.4%

नकद पैसा देने का चलन बढ़ा

पिछले कुछ सालों से जनता को सीधे पैसे देने का चलन बढ़ा है। चुनाव के वक्त हर सरकार ऐसी नई योजना घोषित करती रही है। सबसे ताजा उदाहरण बिहार का है।

अनेक राज्य अलग-अलग वर्ग के नागरिकों (खास कर महिलाओं) को सीधे उनके बैंक खाते में पैसे भेज रहे हैं। केंद्र भी किसान सम्मान निधि जैसी योजना के नाम पर सीधे खाते में पैसे देने की योजना चला रहा है। जीडीपी का अच्छा-खासा हिस्सा जनता को नकद बांटने पर खर्च हो रहा है।

राज्यप्रमुख योजनालाभवार्षिक अनुमानित खर्च
तमिलनाडुकलैग्नार मगलिर उरीमई थोगाई₹1,000/माह (1.31 करोड़ महिलाएं)~₹16,000 करोड़
कर्नाटकगृह लक्ष्मी योजना₹2,000/माह (1.15 करोड़ महिलाएं)~₹17,500 करोड़
मध्य प्रदेशलाड़ली बहना योजना₹1,250/माह (1.26 करोड़ महिलाएं)~₹18,984 करोड़
हरियाणालाडो लक्ष्मी योजना (2025)₹2,100/माह~₹5,000 करोड़
हिमाचल प्रदेशइंदिरा गांधी नारी सम्मान निधि₹1,500/माह~₹800 करोड़

यह तब है, जब RBI ने 'स्टेट फाइनेंस' रिपोर्ट (2025-26) में कहा है कि मुफ्त की ऐसी योजनाओं के चलते राज्यों के बजट पर दबाव बढ़ रहा है। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में बुनियादी ढांचे (सड़क, स्कूल, अस्पताल) पर खर्च कुल बजट का 10% से भी कम रह गया है। साथ ही, राज्यों का सामूहिक राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) बढ़कर जीडीपी का 3.3% हो गया है, जो निर्धारित 3% की सीमा से अधिक है।

राज्यविकास पर खर्च (प्रति ₹100)मुफ्त योजनाओं पर खर्च (प्रति ₹100)
गुजरात₹72₹8
उत्तर प्रदेश₹65₹12
पंजाब₹42₹28
तेलंगाना₹55₹22

16वें वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यहां तक चेताया है कि इसी तरह से मुफ्त की योजनाएं चलती रहीं तो सरकारों के लिए कर्ज जुटाने तक में मुश्किल आ सकती है।

Updated on:
19 Feb 2026 05:09 pm
Published on:
19 Feb 2026 04:22 pm
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