
Somme Battle Tanks: युद्ध के मैदान में टैंक की कहानी सिर्फ भारी लोहे, तोप और बख्तरबंद सुरक्षा की कहानी नहीं है। प्रथम विश्वयुद्ध के सोम युद्धक्षेत्र से शुरू हुआ यह अध्याय 1965 में भारत-पाकिस्तान के असल उत्तर तक पहुंचा, जहां भारतीय रणनीति ने पाकिस्तान के शक्तिशाली पैटन टैंकों की बढ़त को उलट दिया। आज यूक्रेन जैसे युद्धों ने टैंकों के सामने ड्रोन और एंटी-टैंक हथियारों की नई चुनौती खड़ी कर दी है। सवाल यही है क्या टैंक अब भी निर्णायक हथियार हैं?
1916 का प्रथम विश्वयुद्ध। यूरोप का पश्चिमी मोर्चा खाइयों, कांटेदार तारों और मशीनगनों से पटा था। पैदल सैनिक आगे बढ़ते तो मशीनगनों की बौछार उन्हें रोक देती। इसी गतिरोध को तोड़ने के लिए ब्रिटेन ने एक ऐसी बख्तरबंद मशीन तैयार की, जो खाइयों और तारों को पार कर सके।
15 सितंबर 1916 को फ्रांस के सोम क्षेत्र में फ्लेर-कूर्सेलेट की लड़ाई में ब्रिटिश सेना ने पहली बार टैंकों को युद्ध में उतारा। नेशनल आर्मी म्यूजियम के अनुसार, शुरुआती अभियान के लिए 49 टैंकों की योजना थी, लेकिन खराबी और तकनीकी समस्याओं के कारण केवल 15 टैंक ही नो-मैन्स-लैंड में आगे बढ़ सके। फिर भी इन विशाल मशीनों ने जर्मन सैनिकों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला।
यानी टैंक की पहली लड़ाई कोई शानदार विजय नहीं थी। वह तकनीकी प्रयोग ज्यादा थी, लेकिन उसी प्रयोग ने आने वाले दशकों की बख्तरबंद युद्धकला की नींव रख दी।
करीब पांच दशक बाद टैंक भारत-पाकिस्तान युद्ध में एक बार फिर निर्णायक भूमिका में नजर आए। सितंबर 1965 में पंजाब के असल उत्तर-कैमकरन क्षेत्र में पाकिस्तान ने अमेरिकी मूल के M48 पैटन टैंकों से बड़ा बख्तरबंद हमला किया। पाकिस्तान की योजना भारतीय मोर्चे को तोड़कर आगे बढ़ने की थी।
लेकिन भारतीय सेना ने सीधी भिड़ंत के बजाय इलाके और परिस्थितियों का फायदा उठाया। खेतों में पानी भरने, रक्षात्मक मोर्चे तैयार करने और एंटी-टैंक हथियारों की तैनाती ने पाकिस्तानी टैंकों की गति और क्षमता को सीमित कर दिया। भारतीय सैनिकों ने कई पैटन टैंकों को निशाना बनाया। इसी लड़ाई के दौरान कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद ने असाधारण साहस दिखाया और परमवीर चक्र से सम्मानित हुए।
2025 में भारतीय सेना की गोल्डन ऐरो डिवीजन की ओर से असल उत्तर की 60वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में इस युद्धभूमि को ‘ग्रेवयार्ड ऑफ पैटन टैंक्स’ के नाम से याद किया गया। आकाशवाणी की रिपोर्ट के मुताबिक, वहां 95 से अधिक पैटन टैंकों के नष्ट होने का उल्लेख किया गया।
टैंक युद्ध के अनुभवों ने भारत के सामने एक बड़ी जरूरत रखी ऐसा मुख्य युद्धक टैंक विकसित करना जो भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप हो और विदेशी निर्भरता कम करे। इसी सोच से अर्जुन मेन बैटल टैंक कार्यक्रम आगे बढ़ा।
DRDO के अनुसार, अर्जुन के लिए 120 मिमी की मुख्य तोप और उससे जुड़ा गोला-बारूद विकसित किया गया है। इसके Mk-1A संस्करण में पहले मॉडल की तुलना में कई सुधार किए गए हैं। 2021 में रक्षा मंत्रालय ने 118 अर्जुन Mk-1A टैंकों के लिए 7,523 करोड़ रुपये का अनुबंध किया था। इस संस्करण में 72 नए फीचर जोड़े गए थे और स्वदेशी सामग्री का हिस्सा भी बढ़ाया गया था।
अर्जुन की एक खासियत इसकी सुरक्षा व्यवस्था है। इसमें ‘कंचन’ आर्मर, आधुनिक फायर-कंट्रोल सिस्टम और दिन-रात लक्ष्य पहचानने की क्षमता जैसे फीचर शामिल हैं। DRDO के शोध कार्यक्रमों में अब सक्रिय सुरक्षा प्रणाली, स्मार्ट आर्मर, AI आधारित टारगेट रिकग्निशन और बख्तरबंद वाहनों के लिए स्वायत्त संचालन जैसी तकनीकों पर भी काम हो रहा है।
हालांकि भारी वजन इसकी बड़ी चुनौती भी है। DRDO के आंकड़ों के अनुसार अर्जुन Mk-1A का वजन लगभग 68 टन है, जिसके कारण इसके परिवहन और कुछ इलाकों में संचालन के लिए विशेष व्यवस्थाओं की जरूरत पड़ती है।
यही आज का सबसे बड़ा सवाल है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने टैंक के लिए खतरे का स्वरूप जरूर बदल दिया है। रॉयटर्स की फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन के युद्धक्षेत्र में ड्रोन इतनी बड़ी संख्या में इस्तेमाल हो रहे हैं कि बख्तरबंद वाहनों की खुली आवाजाही पहले की तुलना में कहीं अधिक जोखिम भरी हो गई है। FPV ड्रोन कम लागत में टैंक जैसे महंगे लक्ष्य को निशाना बना सकते हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि टैंक अप्रासंगिक हो गए हैं। टैंक की ताकत उसकी चलती हुई मारक क्षमता, सुरक्षा और सैनिकों को सीधे युद्धक्षेत्र में पहुंचाने की क्षमता में है। भविष्य का टैंक अकेले नहीं लड़ेगा। उसके साथ ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, सैटेलाइट निगरानी, एंटी-ड्रोन सिस्टम और नेटवर्क आधारित कमांड सिस्टम का तालमेल जरूरी होगा।
यानी सोम में टैंक ने खाइयों के खिलाफ युद्ध का तरीका बदला था। 1965 में भारत ने दिखाया कि बेहतर रणनीति भारी टैंकों की ताकत को भी निष्प्रभावी कर सकती है। अब ड्रोन युग एक नया सबक दे रहा है भविष्य का टैंक सिर्फ मजबूत कवच वाला वाहन नहीं, बल्कि सेंसर, नेटवर्क और ड्रोन से जुड़ा चलता-फिरता युद्धक प्लेटफॉर्म होगा।