राष्ट्रीय

बेटी की शादी पर दहेज देता है पूरा गांव, आज तक नहीं खरीदी गई अंतिम संस्कार की लकड़ी

आदिवासी बहुल दमोह के 25 गांवों के रिवाज सद्भाव की शिक्षा दे रहे हैं। किसी घर में ब्याह हो तो दहेज से लेकर शादी का खर्च पूरा गांव मिलकर उठाता है ।पेश है आकाश तिवारी की स्पेशल रिपोर्ट।

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Sep 18, 2024

हटा ब्लॉक का वर्धा गांव… 300 से ज्यादा घर कच्चे हैं, पर उनमें रहने वालों के रिश्ते पक्के। इतने कि किसी की मौत हो जाए तो अंतिम संस्कार के लिए घरवालों को लकडिय़ां नहीं खरीदनी पड़ती। गांव के हर घर से एक-दो लकड़ी लेकर लोग आते हैं और अंतिम संस्कार होता है। किसी घर में ब्याह हो तो दहेज से लेकर शादी का खर्च पूरा गांव मिलकर उठाता है। जिले के हटा और जबेरा ब्लॉक के 25 गांव रिश्तों की ऐसी ही पक्की डोर से बंधे हैं। गांव में पांच पीढिय़ों से चली आ रही परंपरा आज भी निभाई जा रही है। आदिवासी युवा शक्ति जयस के प्रदेश संगठन मंत्री श्रीकांत पोरते का कहना है, आदिवासी समाज को शिक्षित करने के लिए नि:शुल्क कोचिंग सुविधा शुरू की है। महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई से सशक्त बना रहे हैं।

अस्थि विसर्जन तक पूरा गांव रहता साथ

चौरईया गांव के आदिवासी पंचम और बटियागढ़ के मोहन ने बताया, गांव में किसी के यहां मौत होती है तो पूरा गांव उस परिवार के साथ रहता है। तेरहवीं तक गांव के लोग मिलकर काम करते हैं। अस्थि विसर्जन के लिए पैसे न हो तो मदद भी करते हैं।

सुख हो या दुख, नहीं छोड़ते हाथ

सुंदर आदिवासी, शिवलाल, मोहन ने बताया, आदिवासियों में एकजुटता है। सुख-दुख में साथ रहते हैं। किसी की बेटी की शादी हो तो दहेज से लेकर शादी का खर्च भी गांव उठाता है। बर्तन भी घरों से आते हैं। बारात का खाना भी मिलकर बनाते हैं। यह हमारी बरसों पुरानी परंपरा है।

Updated on:
19 Sept 2024 11:12 am
Published on:
18 Sept 2024 10:44 pm
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