Tribhasha Formula: तमिलनाडु के सीएम ने एक पत्र लिखकर कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार की कई 25 मूल भाषाएं हिंदी अपनाने के दबाव से नष्ट हो रही हैं। आइए जानते हैं त्रिभाषा फॉर्मूला क्या है और यह कब पेश किया गया और इसके लागू करने के पीछे क्या सोच थी?
Three Language Vivad : नई शिक्षा नीति (New Education Policy) और त्रिभाषा फॉर्मूले (Three-Language Formula) का विरोध कर रहे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन (Tamilnadu CM MK Stalin) ने गुरुवार को फिर हिंदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अन्य राज्यों में हिंदी जबरन अपनाने से 100 साल में 25 मूल उत्तर भारतीय भाषाएं नष्ट हो गईं। ‘अखंड हिंदी पहचान’ के लिए दबाव ही प्राचीन भाषाओं को खत्म करता है।
अपनी पार्टी (द्रमुक) के कार्यकर्ताओं के लिखे पत्र में स्टालिन ने कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार कभी ‘हिंदी हार्टलैंड’ नहीं थे। उनकी मूल भाषाएं अब अतीत के अवशेष हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में बोली जाने वाली मैथिली, ब्रजभाषा, बुंदेलखंडी और अवधी जैसी कई भाषाओं को हिंदी ने नष्ट कर दिया। उन्होंने हिंदी को मुखौटा को संस्कृत को चेहरा बताते हुए केंद्र सरकार पर 2026 के चुनाव से पहले राजनीतिक कथा बनाने के लिए तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप लगाया। तमिलनाडु के सीएम MK Stalin ने कहा कि जागरूकता के कारण सदियों पुराने द्रविड़ आंदोलन ने तमिलों और उनकी संस्कृति की रक्षा की। तमिलनाडु नई शिक्षा नीति का इसलिए विरोध कर रहा है क्योंकि इसके माध्यम से केंद्र हिंदी और संस्कृत थोपने की कोशिश कर रहा है।
वहीं रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि हिंदी देश के सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा है। रक्षा मंत्रालय की पत्रिका ‘सशक्त भारत’ के पहले संस्करण का विमोचन करते हुए उन्होंने कहा कि सभी को हिंदी अपनाना और इसके प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने राजभाषा प्रभाग, रक्षा मंत्रालय के प्रयासों की सराहना की।
Tribhasha formula kya hai: त्रिभाषा सूत्र फॉर्मूला वर्ष 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पेश किया गया था। इसके अंतगर्त यह विचार पेश किया गया था कि भारत के हर प्रांत के विद्यार्थियों को कम से कम तीन भाषाएं सीखनी चाहिए। त्रिभाषा फॉर्मूले के तहत दो भाषाएं भारतीय मूल की हों और तीसरी अंग्रेजी होनी चाहिए। इस सूत्र को सरकारी और निजी स्कूलों में समान रूप से लागू करने की बात कही गई थी। इस सूत्र के तहत हर राज्य के विद्यार्थियों को अपने राज्य के भाषा को एक विकल्प के तौर पर चुनने की आजादी दी गई।
त्रिभाषा सूत्र का सुझाव भारतीय शिक्षा आयोग ने 1964-1966 दिया था। इस आयोग को कोठारी आयोग के नाम से भी जाना जाता है। डॉ. दौलत सिंह कोठारी ने इसकी अध्यक्षता की थी. इस आयोग ने साल 1966 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। इसके आधार पर ही 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे शामिल किया गया था।