
Patrika Ground Report: घरों की छतों पर उगे बेतरतीब कैक्टस, लकड़ी के सुंदर नक्काशीदार दरवाजों पर लटके उदास ताले और पहाड़ों के बंजर हो चुके प्रसिद्ध सीढ़ीदार खेत जो अब केवल जानवर चराने के काम आ रहे हैं, यह सब मिलकर उत्तराखंड की नई तस्वीर बना रहे हैं। वजह, गांवों से पलायन। आंकड़े पलायन की गति की गवाही देते हैं। जनगणना 2011 में यहां 1048 गांव निर्जन मिले थे, लेकिन डेढ़ दशक बाद विशेषज्ञ व सरकारी एजेंसियों के सर्वे बता रहे हैं कि इनकी संख्या अब 2,500 के करीब है।
हालात की व्यापकता समझने के लिए 'पत्रिका' ने विभिन्न गांवों का दौरा किया तो सामने आया कि 'देवभूमि' श्रद्धालुओं और पर्यटकों को जितना आकर्षित कर रही है, इसके दोनों प्रमुख हिस्सों कुमाऊं और गढ़वाल में स्थानीय निवासियों के लिए रहना उतना ही मुश्किल हो चुका है। पेश है सीरीज की पहली रिपोर्ट....
प्रदेश के गांवों में पलायन की गति तेजी से बढ़ी है। प्रदेश में अब 15% गांव वीरान हो चुके हैं। पलायन करने वालाें में युवाओं की संख्या ज्यादा है। कामकाज संभालने वाला युवा (26-35 वर्ष) वर्ग पलायन करने वालों में सबसे ऊपर (42.25%) है। इसके बाद 35 वर्ष से अधिक (29.09%) और 25 वर्ष से कम (28.66%) आयु वाले आते हैं।
| वर्ष | निर्जन गांवों की संख्या |
|---|---|
| 2011 | 1,048 |
| 2018 | 1,950 |
| 2025 | 2,462 |
अल्मोड़ा के छानागोलू गांव में महेश कुमार भट्ट करीब 15 वर्ष प्रधान रहे। बातचीत शुरू हुई तो उन्होंने बताया कि गांव में 250 परिवार थे, आज 40 रह गए हैं। वह हमें पड़ोस के गांव भेंट में ले चलते हैं, जो निर्जन हो चुका है। मकान खंडहर हो चुके हैं और छतों पर 6-7 फीट के कैक्टस उग आए हैं। उन्होंने ऐसे पुराने घर भी दिखाए जो हाल ही में रिपेयर करवाए गए थे, लेकिन घर के जवान सदस्य दूसरे राज्यों में काम कर रहे हैं, इसलिए अब वे बेकार पड़े हैं। गांव का प्राथमिक स्कूल भी बंद कर दिया है, क्योंकि छोटे बच्चे नहीं है। उत्तराखंड में 16,793 गांव हैं, इनमें से करीब 15% गांव निर्जन माने जा रहे हैं।
अल्मोड़ा की विभिन्न तहसीलों के 105 गांव निर्जन श्रेणी में आते हैं। इनमेंं अगिना, बाणघाट, गैरखोली, सिंदूरी, पोखरी नायल, जैसे पुराने गांव भी हैं। इसी तरह बागेश्वर में 75 गांव निर्जन हैं, जिनमें द्वाली, बारखंड, अमोली, गोलगोन आदि शताब्दियों पुराने गांव हैं।
महेश भट्ट भेंट गांव में ही अपने एक घर में ले गए, जिसे उन्होंने पिछले साल रिपेयर करवाया, लेकिन अब वहां भी ताला बंद है। वह खुद निर्जन गांव में रहना नहीं चाहते। वह अपने घर के सीसीटीवी कैमरे की एक क्लिप दिखाते हैं, जिसमें घर के सामने से गुजरता तेंदुआ नजर आ रहा है। उन्हाेंने बताया कि लकड़ी पर नक्काशीदार काम करवाते हुए मकान को रिपेयर करवाया था, लेकिन अब बेकार पड़ा है।
महज 20% आबादी के साथ किसी तरह आबाद छानागोलू गांव भी बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है। यहीं के मुकेश बिष्ट ने बताया कि आसपास के गांवों में बीते दो दशक में आबादी तेजी से गिरी है। इसका असर कई तरह से हो रहा है। आसपास के गांवों में 120 युवा शादी के इंतजार में बूढ़े हो रहे हैं। कोई भी अपनी बेटी खत्म होते गांवों में देना नहीं चाहता।
निर्जन गांवों के साथ साथ बड़ी संख्या में गांव ऐसे भी हैं, जिनमें 50 से 90% लोग पलायन कर चुके हैं। 2011 से 2025 के बीच ऐसे 3,946 गांव हैं। यहां से 1.46 लाख लोग अपने घर-जमीनें व अन्य संपत्तियां बेच कर पूरी तरह पलायन कर चुके हैंं। वहीं 6,436 गांवों के 6.91 लाख लोगों ने अस्थायी पलायन किया। यह लोग कभी कभार गांव आते हैं।
उत्तराखंड से पलायन रोकने के लिए 2017 में पलायन निवारण आयोग बना। उसने 2025 में पलायन केे कारणों को बताते हुए एक सर्वे रिपोर्ट जारी की। इसमें यह वजहें बताई गईं...