Climate change impact on forests: उत्तराखंड से लेकर जम्मू कश्मीर तक इस बार सर्दियों के मौसम में जंगल में आग की घटनाएं सामने आई हैं। जबकि पहले ऐसा केवल गर्मियों में देखने को मिलता था।
Winter forest fires: जलवायु परिवर्तन किस तरह इकोलॉजिकल पैटर्न को प्रभावित कर रहा है, उसका एक उदाहरण जंगलों में लगने वाली आग है। पहले उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी राज्यों के जंगलों में आग की घटनाएं गर्मियों के मौसम में दिखाई देती थीं। बढ़ते तापमान और तेज हवाओं से सूखे पत्ते आग पकड़ लेते थे। लेकिन अब सर्दियों के मौसम में ऐसा हो रहा है। जंगलों में आग का दशकों से चला आ रहा पैटर्न अब टूटने लगा है।
इस बार सर्दियों के मौसम में पहले उत्तराखंड फिर हिमाचल और इसके बाद जम्मू-कश्मीर के जंगलों में आग की घटनाएं सामने आई हैं। वन अधिकारियों और वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अब कोई असामान्य बात नहीं है, बल्कि बदलते इकोलॉजिकल पैटर्न का खतरनाक संकेत है। टीओआई की रिपोर्ट में देहरादून स्थित फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के सीनियर साइंटिस्ट अमित कुमार वर्मा के हवाले से बताया गया है कि जंगल की आग एक प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन उस चक्र को छोटा और तेज कर रहा है। कुमार देश भर में जंगल की आग के बदलते चक्र को समझने के लिए किए जा रहे अध्ययन का भी हिस्सा हैं।
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) के आंकड़े बताते हैं कि इस बार सर्दियों का मौसम शुरू होने के बाद 1 नवंबर से अब तक उत्तराखंड में देश में सबसे अधिक 1,756 फायर अलर्ट दर्ज किए गए हैं। यह संख्या महाराष्ट्र (1,028), कर्नाटक (924), मध्य प्रदेश (868) और छत्तीसगढ़ (862) जैसे उन राज्यों की तुलना में काफी ज्यादा है, जो पारंपरिक रूप से जंगल में आग के मामले में अधिक संवेदनशील माने जाते हैं। अधिकारियों के अनुसार, सैटेलाइट के जरिए मिलने वाले फायर अलर्ट का मतलब यह नहीं है कि जंगल में आग लगी ही हो, लेकिन इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। आमतौर पर दिसंबर जंगल में आग के लिहाज से सबसे शांत महीना माना जाता है, लेकिन पिछले तीन सालों में उत्तराखंड के लिए यह धारणा गलत साबित हुई है।
वन अधिकारियों का कहना है कि सर्दियों के मौसम में जंगल में आग की वजह अत्यधिक सूखापन है। दिसंबर में उत्तराखंड में बिल्कुल भी बारिश नहीं हुई। जंगल की जमीन में नमी का लेवल बहुत कम है। उत्तराखंड की तरह, हिमाचल में भी पिछले साल अक्टूबर के पहले सप्ताह से कोई बारिश नहीं हुई थी। इसी तरह, कुल्लू, मंडी, शिमला और चंबा जैसे प्रमुख सेब उत्पादक इलाकों में भी बर्फबारी लगभग न के बराबर हुई है। इस वजह से जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ी हैं। वन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि शिमला फ़ॉरेस्ट सर्कल में सबसे ज्यादा (62) आग के मामले सामने आए हैं। इसके बाद रामपुर (16), मंडी (8), ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क-कुल्लू (6), चंबा एवं कुल्लू (4-4) और बिलासपुर और वाइल्ड लाइफ (दक्षिण) क्षेत्र (2-2) का नंबर है।
कश्मीर के जंगल भी कम बर्फ वाली सर्दी का सामना कर रहे हैं। इस वजह से घाटी और पीर पंजाल रेंज में आग लगने की खबरें आई हैं। दिसंबर में, दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले में आग बुझाते समय एक फॉरेस्ट गार्ड की मौत हो गई थी। इसके अलावा, 12 जनवरी को पुंछ में जंगल की आग से लाइन ऑफ कंट्रोल के पास लैंडमाइन विस्फोट की खबर भी सामने आई थी। कश्मीर के जंगल कम बर्फबारी के चलते समय से पहले सूखे हो गए हैं, जिससे आग लग रही है। कश्मीर घाटी में इस बार 40% कम बर्फबारी दर्ज की गई है। DFO अवंतीपोरा मुदासिर महमूद का कहना है कि मिट्टी में नमी न होने के कारण, घास-पत्ते बहुत जल्दी आग पकड़ लेते हैं।
जंगल में आग के कुछ दूसरे कारण भी हैं। एक्स्पर्ट्स का कहना है कि कभी-कभी ग्रामीण अपने मवेशियों के लिए ताजी घास उगाने के लिए जंगल में आग लगाते हैं। इसके अलावा, शिकार की गतिविधियों को अंजाम देने के लिए भी ऐसा किया जाता है। उदाहरण के तौर पर शिकारी ऊंचाई वाले इलाकों में कस्तूरी मृग जैसे वन्यजीवों को घेरने के लिए जानबूझकर आग लगाते हैं। जमीन में नमी कम होने से आग तेजी से फैलती चली जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के चलते सर्दियों के मौसम में भी जंगल की भूमि सूखी रहती है, ऐसे में एक चिंगारी भी विकराल रूप धरण कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हालात और खराब इसलिए हो रहे हैं, क्योंकि जंगल को मैनेज करने के पुराने तरीके खत्म हो गए हैं। चराई और ग्रामीणों द्वारा साफ- सफाई में धीरे-धीरे कमी आने से जंगल में सूखी घास और पत्तियां जमा हो जाती हैं। ऐसे में लापरवाही की एक चिंगारी भी पूरे जंगल को तबाह कर सकती है। पहले गांव वाले नियमित रूप से जंगल की घास साफ करते थे। पलायन और दूसरे रोजगार के कारण यह तरीका खत्म होता जा रहा है। एक्स्पर्ट्स का कहना है कि वन प्रबंधन के तरीके पर फिर से गौर करने के साथ ही जलवायु परिवर्तन के पहिये को धीमा करने की भी जरूरत है।