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Vikram Batra : जब ‘कैप्टन’ के साहस से हार गए थे पाकिस्तानी, जानिए कारगिल युद्ध के हीरो की कहानी

Vikram Batra Death Anniversary: कारगिल युद्ध के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा की आज (7 जुलाई) पुण्यतिथि है। साल 1999 में आज ही के दिन मातृभूमि की रक्षा करते हुए कैप्टन बत्रा ने सर्वोच्च बलिदान दिया था।
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Jul 07, 2026
Vikram Batra
Vikram Batra Death Anniversary। फोटो-सोशल मीडिया X

Vikram Batra Death Anniversary: नई दिल्ली। कारगिल युद्ध के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा की आज (7 जुलाई) पुण्यतिथि है। साल 1999 में आज ही के दिन मातृभूमि की रक्षा करते हुए कैप्टन बत्रा ने सर्वोच्च बलिदान दिया था। 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान को करारी शिकस्त देने वाले इस वीर ने अपनी बहादुरी और नेतृत्व से भारतीय सेना में अलग पहचान बनाई। उनका जज्बा, साहस और ‘ये दिल मांगे मोर’ का उद्घोष आज भी हर भारतीय के दिल में गूंजता है।

मर्चेंट नेवी छोड़कर चुनी देश सेवा

कैप्टन विक्रम बत्रा का जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के पालमपुर के घुग्गर गांव में हुआ था। उनके पिता जी.एल. बत्रा एक स्कूल प्रिंसिपल और मां जय कमल बत्रा शिक्षिका थीं। विक्रम की स्कूली पढ़ाई पालमपुर में ही हुई। स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद विक्रम आगे की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ चले गए। कॉलेज में वे एनसीसी एयर विंग में शामिल हो गए। कॉलेज के दौरान ही उन्हें मर्चेंट नेवी के लिए चुना गया था, लेकिन उन्होंने अंग्रेजी में एमए करने के लिए दाखिला ले लिया। इसके बाद विक्रम सेना में शामिल हो गए। 1996 में उन्होंने इंडियन मिलिट्री अकादमी देहरादून में दाखिला लिया और दिसंबर 1997 में 13 जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त हुए। अपने मजबूत नेतृत्व और पराक्रम के चलते उन्हें जल्द ही कैप्टन बना दिया गया।

जब गूंजा- 'ये दिल मांगे मोर!'

1999 में जब पाकिस्तान ने धोखे से कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया, तब कैप्टन बत्रा की बटालियन को वहां भेजा गया। उन्होंने हम्प और राकी नाब जैसे दुर्गम स्थानों पर विजय प्राप्त की। इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण 5140 चोटी को पाक सेना से मुक्त कराने की जिम्मेदारी भी विक्रम बत्रा को मिली। 20 जून 1999 को तड़के 3:30 बजे उन्होंने चोटी पर विजय प्राप्त कर वहां तिरंगा फहराया। विजय के बाद जब उनसे संदेश मांगा गया तो उन्होंने रेडियो पर कहा, ‘ये दिल मांगे मोर’। इसके बाद यह नारा देश में वीरता और साहस का प्रतीक बन गया।

पॉइंट 4875 और विक्रम बत्रा की शहादत

चोटी नंबर 5140 के बाद भारतीय सेना ने चोटी नंबर 4875 (जिसे अब 'बत्रा टॉप' कहा जाता है) को भी कब्जे में लेने का मिशन काम शुरू किया। इस अभियान का नेतृत्व भी कैप्टन विक्रम बत्रा को ही सौंपा गया। 7 जुलाई को टीम ने अभियान शुरू किया। इस चोटी पर पहुंचना बहुत ही मुश्किल था। इसके दोनों तरफ खड़ी ढलान होने की वजह से ऊपर से दुश्मनों का नाकाबंदी ने और भी मुश्किलें बढ़ा दी थी। इस दौरान उन्होंने आमने-सामने की लड़ाई में दुश्मन के 8 सैनिकों को मार गिराया। गंभीर जख्मी होने के बाद भी उन्होंने दुश्मन की ओर ग्रेनेड फेंके। 7 जुलाई 1999 को इस ऑपरेशन में विक्रम शहीद हो गए।

मरणोपरांत मिला परमवीर चक्र सम्मान

कैप्टन विक्रम बत्रा की बहादुरी, नेतृत्व और देशभक्ति के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने साहस से भारतीय सेना और देश का नाम गौरवान्वित किया और उनकी कहानी हर युवा को प्रेरित करती रहेगी। उनके शब्द, ‘या तो तिरंगे को लहराकर आऊंगा या फिर तिरंगे में लिपटकर’, हमें देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देते हैं।

Updated on:
07 Jul 2026 09:58 am
Published on:
07 Jul 2026 09:56 am