
West Bengal Municipal Elections: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मामला अब आगामी नगर निकाय चुनावों में मतदान के अधिकार से जुड़ गया है। जिन लोगों ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान अपने नाम कटने के खिलाफ अपील की है, उनके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि क्या उन्हें चुनाव से पहले न्याय मिल पाएगा। शुक्रवार को चीफ जस्टिस ऑफ (CJI) सूर्यकांत के सामने मामले का जिक्र करते हुए वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन और प्रशांत भूषण ने जल्द सुनवाई की मांग की। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर 16 अक्टूबर को सुनवाई तय की है। अदालत में लंबित मामलों की संख्या और अपीलों के निपटारे की रफ्तार पर भी चिंता जताई गई है।
पश्चिम बंगाल के मतदाता सूची विवाद में 16 अक्टूबर की तारीख इसलिए अहम है, क्योंकि प्रभावित मतदाताओं की मांग केवल नाम बहाल करने तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि अपीलों का फैसला समय रहते हो, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बाधित न हो।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वकीलों ने बताया कि करीब 1.70 लाख अपीलें अब भी लंबित हैं। साथ ही, जिन मामलों में फैसला आ चुका है, उनमें लगभग 93 प्रतिशत नाम शामिल करने की अपीलें स्वीकार की गई हैं। यह आंकड़ा उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो मतदाता सूची से बाहर होने के बाद न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने देरी को लेकर उठाई गई चिंताओं पर ध्यान दिया। सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि चुनावी प्रक्रिया में तकनीक का इस्तेमाल, अपनाई गई कार्यप्रणाली और निष्पक्षता तीनों के बीच संतुलन जरूरी है। अदालत के सामने यह मांग रखी गई कि जिन मतदाताओं की अपीलों पर अभी फैसला नहीं हुआ है, उन्हें आगामी नगर निकाय चुनावों में मतदान करने की अनुमति दी जाए।
हालांकि, लंबित अपील वाले सभी मतदाताओं को वोट डालने की इजाजत मिलेगी या नहीं, इस पर अंतिम निर्णय अदालत की सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा।
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की जांच और उसे अद्यतन करना है। इस प्रक्रिया में मृत, स्थानांतरित, डुप्लिकेट या अन्य कारणों से अयोग्य माने गए नामों की पहचान की जाती है। लेकिन किसी पात्र नागरिक का नाम सूची से हटने पर उसके चुनावी अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए नाम हटाने की प्रक्रिया के साथ आपत्ति दर्ज कराने और अपील के निपटारे की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।
इससे पहले की रिपोर्टों में पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से हटाए गए लाखों नामों और अपीलीय प्रक्रिया पर सवाल उठे थे। इंडियन एक्सप्रेस की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने 27.16 लाख हटाए गए मतदाताओं में से 22 लाख से अधिक लोगों की अपील दायर होने की जानकारी दी थी।
यह व्यापक विवाद बताता है कि मामला केवल प्रशासनिक आंकड़ों का नहीं, बल्कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के अधिकार का भी है।
अब 16 अक्टूबर की सुनवाई में अदालत के सामने दो बड़ी चुनौतियां होंगी लंबित अपीलों का जल्द निपटारा सुनिश्चित करना और यह तय करना कि चुनाव से पहले प्रभावित मतदाताओं को क्या राहत दी जा सकती है। फैसले का असर पश्चिम बंगाल के उन नागरिकों पर पड़ सकता है, जो अपने नाम की बहाली और मतदान के अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।