
Independence Day 2026: हर साल 15 अगस्त की सुबह देश की निगाहें दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर पर टिकी होती हैं, जहां प्रधानमंत्री राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं और राष्ट्र को संबोधित करते हैं। यही परंपरा स्वतंत्रता दिवस की पहचान बन गई है। ऐसे में कई लोगों का मानना है कि स्वतंत्र भारत का पहला ध्वजारोहण समारोह 15 अगस्त 1947 को इसी लाल किले पर हुआ होगा। लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत का पहला सार्वजनिक ध्वजारोहण समारोह लाल किले पर नहीं, बल्कि इंडिया गेट के पास प्रिंसेस पार्क में हुआ था।
नेहरू मेमोरियल संग्रहालय और पुस्तकालय (NMML) और पीआईबी के आधिकारिक अभिलेखीय रिकॉर्ड के अनुसार, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 15 अगस्त 1947 को प्रिंसेस पार्क में तिरंगा फहराया था। उस समय लाखों की भीड़ उस ऐतिहासिक क्षण की गवाह बनी थी। जबकि लाल किले की प्राचीर पर यह समारोह ठीक एक दिन बाद यानी 16 अगस्त 1947 को हुआ था। 16 अगस्त की सुबह नेहरू ने लाल किले से पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराया और वहीं से अपना पहला स्वतंत्रता दिवस भाषण दिया। बाद के वर्षों में 15 अगस्त का मुख्य राष्ट्रीय कार्यक्रम लाल किले पर आयोजित होने लगा।
तो लाल किला भारत के स्वतंत्रता दिवस समारोह का स्थायी स्थल कैसे बन गया? इसका जवाब रातों-रात जारी किसी सरकारी आदेश में नहीं, बल्कि लाल किले के गौरवशाली इतिहास में ही छिपा है. लगभग एक शताब्दी तक, लाल किला एक ऐतिहासिक केंद्र था जहां राजनीतिक शक्ति, विद्रोह और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का टकराव हुआ।
लाल किले और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के जुड़ाव की नींव मई 1857 में पड़ी थी। जब मेरठ में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सिपाहियों का विद्रोह भड़का, तो सैनिकों ने सबसे पहले दिल्ली की ओर कूच किया। सैनिकों की यह मंजिल कोई संयोग नहीं थी। उस समय लाल किला अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का निवास था। हालांकि, मुगलों की राजनीतिक शक्ति पहले ही कमजोर हो चुकी थी, फिर भी उन्हें पूरे भारत में संप्रभु और वैध शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता था।
विद्रोही सैनिकों ने बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित कर दिया और लाल किला अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का मुख्य केंद्र बन गया। जब ब्रिटिश सरकार ने इस क्रांति को कुचल दिया, तो उन्होंने 1858 में बहादुर शाह जफर को कैद कर इसी लाल किले के अंदर उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया और उन्हें रंगून (म्यांमार) निर्वासित कर दिया।
अंग्रेजों के लिए, 1857 के विद्रोह को दबाने के बाद लाल किले पर नियंत्रण सिर्फ एक इमारत पर कब्जा करना नहीं था, बल्कि यह पूरे भारत पर उनकी राजनीतिक शक्ति की अधीनता का प्रतीक था। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने जानबूझकर किले का स्वरूप बदल दिया। अंग्रेजों ने लाल किले के अंदरूनी हिस्से का दो-तिहाई हिस्सा पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। इसके भव्य दीवान और महलों को सैन्य चौकियों, बैरकों, अस्पतालों और प्रशासनिक कार्यालयों में बदल दिया गया।
1857 की क्रांति के लगभग नौ दशक बाद, लाल किले का यह ऐतिहासिक महत्व एक बार फिर जीवंत हो गया जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 'आजाद हिंद फौज' (आईएनए) का गठन किया और अपनी सेना को प्रसिद्ध युद्ध घोष 'चलो दिल्ली' दिया। नेता जी का यह नारा सिर्फ दिल्ली तक पहुंचने के लिए नहीं था, बल्कि लाल किले पर तिरंगा फहराकर भारत की संप्रभुता वापस पाने का संकल्प था। हालांकि आजाद हिंद फौज को युद्ध के मैदान में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन लाल किले से जुड़ा उनका संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सरकार ने आजाद हिन्द फौज के अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने जानबूझकर उसी लाल किले को चुना, जहां 1858 में बहादुर शाह जफर पर मुकदमा चलाया गया था। नवंबर 1945 में कर्नल प्रेम कुमार सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों और मेजर जनरल शाहनवाज खान पर ऐतिहासिक 'लाल किला मुकदमा' शुरू हुआ।
ब्रिटिश सरकार का उद्देश्य इन अधिकारियों को विद्रोही साबित करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना था, लेकिन यह कदम उनके लिए आत्मघाती साबित हुआ। इन परीक्षणों ने देश के हर वर्ग और धर्म के लोगों को एकजुट किया और पूरे देश में ब्रिटिश विरोधी लहर फैल गई। वकालत की पोशाक पहनकर पंडित जवाहरलाल नेहरू, भूलाभाई देसाई, सर तेज बहादुर सप्रू और कैलाश नाथ काटजू के साथ आईएनए की रक्षा में खड़े हुए। इस मुकदमे ने ब्रिटिश सेना में सेवारत भारतीय सैनिकों की निष्ठा को हिलाकर रख दिया, जिससे अंततः अंग्रेजों के भारत छोड़ने की प्रक्रिया तेज हो गई।
1857 की क्रांति, 1858 का जफर केस, 1945 का आईएनए केस और फिर 1947 की आजादी, इन सभी घटनाओं ने मिलकर लाल किले को जनमानस में क्रांति और संप्रभुता का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया। 1947 में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान मंत्री ने लाल किले की उसी प्राचीर से तिरंगा फहराया था, जिसका इस्तेमाल ब्रिटिश सरकार 90 वर्षों तक भारतीयों की आवाज़ को दबाने और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए करती रही थी।