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 जब साथी के आंसू देख बस के आगे कूद पड़े योगी आदित्यनाथ! 

CM Yogi College Life Story: योगी आदित्यनाथ के कॉलेज के दिनों की कहानी, जब वह अजय मोहन सिंह बिष्ट के नाम से जाने जाते थे। किताब में उनके दोस्तों, व्यायाम, छात्र राजनीति और दूसरों की मदद से जुड़े कई प्रसंगों का जिक्र मिलता है।
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Sep 29, 2026
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। फोटो-IANS

CM Yogi College Life Story: उत्तर प्रदेशके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथराजनीति में कैसे आए, सभी जानते हैं, लेकिन कॉलेज के दिनों में वह कैसे थे, क्या करते थे, इसके बारे में लोगों को कम ही पता है। आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित किताब‘द मॉन्क हू बिकेम चीफ मिनिस्टर’ में योगी आदित्यनाथ के कॉलेज के जीवन का भी जिक्र है। उस दौर में योगी को अजय मोहन सिंह बिष्ट के नाम से जाना जाता था।

1989 में, अजय बिष्ट ने ग्रेजुएशन करने के लिए कोटद्वार (अब उत्तराखंड का हिस्सा) के PG गवर्नमेंट कॉलेज में एडमिशन लिया। यहां उनकी कुछ स्टूडेंट्स एक साथ अच्छी दोस्ती थी- राज भूषण सिंह रावत, अनिल बिष्ट, संदीप बिष्ट, अनूप कंडारी, हर्षपाल राणा, अरविंद बंसल, नीरज अग्रवाल, बबीता राणा, सरस्वती रावत और आरती ढोंडियाल। आज भी इनमें से कुछ अजय बिष्ट यानी योगी आदित्यनाथ के संपर्क में हैं। शांतनु गुप्ता ने अपनी किताब ‘द मॉन्क हू बिकेम चीफ मिनिस्टर’ में लिखा है- अजय सहित पूरा ग्रुप रोज सुबह कोटद्वार के झंडा चौक से सिद्धबली हनुमान मंदिर तक 3 किलोमीटर दौड़ता था। फिर सभी बैडमिंटन खेलते, अजय योग का अभ्यास करते थे। वह नियमित रूप से अपने एक्सरसाइज रूटीन को फॉलो करते थे। पूरा ग्रुप अक्सर कालागढ़, ताड़केश्वर और मसूरी जैसी आस-पास की जगहों पर पिकनिक के लिए जाता। अजय सीधे-सादे और कम बोलने वाले थे, फिर भी वे शहर के ट्रेंड्स के साथ चलने की कोशिश करते। कॉलेज की कुछ तस्वीरों में अजय गॉगल्स और बंडाना पहने नजर आते हैं।

सबको सुरक्षित घर पहुंचाया 

कॉलेज के पहले साल में उनकी एक क्लासमेट सरस्वती रावत, कॉलेज स्टूडेंट इलेक्शन में जॉइंट सेक्रेटरी पद के लिए खड़ी हुई थी। अजय और बाकी साथी सरस्वती के चुनाव प्रचार के लिए डुगड्डा नाम की जगह पर गए। जब तक उनका कैंपेन खत्म हुआ, तब तक शाम के लगभग 6 बज चुके थे। कोई भी बस उनके लिए नहीं रुकी क्योंकि कॉलेज के छात्र बिना टिकट के बस में सफर करने के लिए बदनाम थे। बदकिस्मती से, कोटद्वार शहर वापस जाने का एकमात्र साधन बस ही थी और अंधेरा हो रहा था। उन दिनों मोबाइल फोन नहीं होते थे, इसलिए छात्रों के पास घर पर अपने परिवार वालों को खबर देने का कोई तरीका नहीं था।

उनकी एक साथी बबीता राणा को बहुत चिंता हो रही थी कि उसके माता-पिता परेशान होंगे और शायद उसे घर में घुसने भी न दें। बबीता की आंखों में आंसू आ गए, तभी उसने देखा कि अजय अचानक अगली बस के सामने जाकर खड़े हो गए और ड्राइवर को ब्रेक लगाने के लिए मजबूर कर दिया। बस अजय से बस कुछ इंच की दूरी पर रुकी। उन्होंने सबसे पहले ग्रुप की सभी लड़कियों को बस में चढ़ाया। इस तरह, अजय पूरे ग्रुप को सुरक्षित कोटद्वार वापस ले आए। यह कोई आम घटना नहीं थी। यह महिलाओं की सुरक्षा और हिफाजत के प्रति उसके गहरे सम्मान को दिखाता है।

SFI के बजाए चुना ABVP

the monk who became chief minister

अपने छात्र जीवन मेंयोगी आदित्यनाथदूसरों की मदद को तत्पर रहते थे। दूसरे जहां हाथ खड़े कर देते, योगी मैदान में उतरते और जरूरतमंदों को सहायता पहुंचाते। अजय कॉलेज के दिनों में छात्र राजनीति का हिस्सा केवल इसलिए बने, ताकि छात्रों की परेशानियों को दूर किया जा सके। उनकी बहन कौशल्या की शादी कोटद्वार में हुई थी और उनके बहनोई 'स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया' (SFI) से जुड़े थे, जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) से जुड़ा एक वामपंथी छात्र संगठन है। बहनोई ने अजय को SFI के बैनर तले छात्र राजनीति में शामिल होने का ऑफर दिया, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। इसके बजाए वह RSS के छात्र संगठन 'अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद' (ABVP) में शामिल हो गए। ABVP में उन्होंने एक जमीनी कार्यकर्ता के रूप में काम किया। जब उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन चल रहा था, तब हुए विरोध प्रदर्शन में, उन्हें पुलिस के लाठीचार्ज का सामना करना पड़ा और उन्होंने एक वरिष्ठ कार्यकर्ता, राकेश चमोली की जान भी बचाई।

परिवार तक पहुंचाया कार्यकर्ता का शव

किताब में बताया गया है- कॉलेज के आखिरी साल में कोटद्वार में ABVP की एक बड़ी कार्यशाला आयोजित की गई थी, जिसमें बाहर से आए एक कार्यकर्ता को हैजा हो गया और दुर्भाग्य से कार्यशाला के दौरान ही उनकी मौत हो गई। कार्यकर्ता के शव को उनके घर पहुंचाने के लिए जब कोई आगे नहीं आया, तब अजय आगे आए। उन्होंने एक स्वयंसेवक के साथ मिलकर मृतक के शव को उसके परिवार को सौंपा। इसके बाद अजय भी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। योगी आदित्यनाथ में कॉलेज के दिनों से दूसरों की मदद की जो भावना और जज्बा था, वो आज यूपी के मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी योजनाओं में भी झलकता है।