
Delhi Building Collapse: दिल्ली में पढ़ाई और कोचिंग के लिए आने वाले लाखों छात्रों के लिए रहने की व्यवस्था अब एक कारोबार बन चुकी है। हाल ही में दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक पांच मंजिला इमारत के ढहने से हुए हादसे ने पीजी और हॉस्टल के नाम पर चल रही इस व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। सिर्फ 55 गज के छोटे से प्लॉट पर बनी 6 मंजिला इमारत में 20 कमरों के अंदर 60 बेड ठूंस दिए गए थे, जिससे हर महीने करीब 7 से 7.5 लाख रुपये का मोटा किराया वसूला जा रहा था। इस हादसे के बाद अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या दिल्ली में छात्रों की सुरक्षा और मनमाने किराए को रोकने के लिए कोई कानून मौजूद है।
दिल्ली में फिलहाल ऐसा कोई अलग या सख्त कानून नहीं है जिसके तहत हर पीजी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो या किसी सरकारी एजेंसी द्वारा नियमित जांच की जाती हो। साल 1993 में केंद्र सरकार ने पेयिंग गेस्ट योजना शुरू की थी, जिसे 2000 में दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार ने लागू किया था। उस समय नियम यह था कि मकान मालिक खुद उसी घर में रहे और अधिकतम 4 कमरों में केवल 8 बेड तक की ही इजाजत दी जाए। लेकिन आज दिल्ली विश्वविद्यालय, मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर और करोल बाग जैसे इलाकों में पूरे के पूरे मकान और बहुमंजिला इमारतें बिना किसी स्पष्ट निगरानी के हॉस्टल में तब्दील हो चुकी हैं।
राजधानी में पीजी के किराए पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं होने के कारण संचालक मनमर्जी से रेट तय करते हैं। कोचिंग हब और यूनिवर्सिटी एरिया में एक बेड का किराया 20 से 25 हजार रुपये प्रति माह तक वसूला जाता है। इसके अलावा बिजली, पानी और खाने का चार्ज अलग से लिया जाता है। सुविधाओं और बुनियादी सुरक्षा इंतजामों के अभाव के बावजूद मजबूरी में छात्रों को भारी-भरकम किराया देना पड़ता है।
लगातार सामने आ रहे हादसों के बाद अब सरकार एक नई नीति पर काम कर रही है। प्रस्तावित नियमों के तहत पीजी के लिए किराए की सीमा यानी 'रेंट बैंड' तय करने का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा इमारतों की मजबूती, फायर सेफ्टी और रहने के न्यूनतम मानकों का पालन अनिवार्य किया जाएगा। अगर यह नई व्यवस्था लागू होती है तो बिना तय पैमानों के पीजी चलाना संभव नहीं होगा और मनमाने किराए से छात्रों को बड़ी राहत मिलेगी।