
नई दिल्ली। संसद की श्रम, वस्त्र एवं कौशल विकास संबंधी स्थायी समिति की बैठक में राजस्थान के टेक्सटाइल उद्योग को लेकर महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया। समिति के सदस्य और राजस्थान से राज्यसभा सांसद सतीश पूनिया ने कहा कि देश की टेक्सटाइल प्रोत्साहन नीति कुछ चुनिंदा केंद्रों तक सिमट गई है, जबकि राजस्थान के कई पारंपरिक वस्त्र क्लस्टरों में बड़े स्तर पर विकास की संभावनाएं हैं।
बैठक में वस्त्र मंत्रालय के अधिकारियों के साथ हैंडलूम, पावरलूम, पीएम मित्र योजना, समर्थ योजना, हैंडलूम के लिए कच्चा माल आपूर्ति योजना तथा वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट के तहत टेक्सटाइल को बढ़ावा देने सहित कई विषयों पर चर्चा हुई।
सूत्रों के अनुसार, बैठक में सतीश पूनिया ने कहा कि मंत्रालय की योजना के अनुसार देश के करीब 80 प्रतिशत टेक्सटाइल और हैंडलूम कारोबार का केंद्र सूरत, भिवंडी और सलेम जैसे चुनिंदा क्षेत्र हैं, जबकि बाकी 20 प्रतिशत हिस्से के विकास के लिए कोई ठोस रणनीति दिखाई नहीं देती। उनका कहना था कि अत्यधिक केंद्रीकरण से उद्योग और आपूर्ति श्रृंखला दोनों प्रभावित होती हैं तथा नए क्षेत्रों के विकास की संभावनाएं सीमित रह जाती हैं।
उन्होंने विशेष रूप से भीलवाड़ा को देश का प्रमुख टेक्सटाइल हब बनाने की दिशा में विशेष योजना तैयार करने की मांग की। इसके साथ ही बाड़मेर, पाली, बालोतरा, बगरू और सांगानेर जैसे राजस्थान के पारंपरिक वस्त्र एवं प्रिंटिंग केंद्रों की क्षमता का भी उल्लेख करते हुए इनके लिए अलग प्रोत्साहन नीति बनाने का सुझाव दिया। समिति की बैठक में मौजूद वस्त्र मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि कुछ योजनाएं चल रही हैं। उन्होंने पूनिया के सुझावों पर सकारात्मक रुख दिखाते हुए आश्वासन दिया कि सूरत-भिवंडी-सेलम जैसे स्थापित केंद्रों के अलावा अन्य पोटेंशियल टेक्सटाइल क्लस्टरों के लिए भी योजना तैयार करने पर विचार किया जाएगा।
मंत्रालय अलग प्रोत्साहन योजना लाता है तो भीलवाड़ा के सिंथेटिक और सूटिंग उद्योग, बाड़मेर की अजरख प्रिंटिंग, पाली और बालोतरा की टेक्सटाइल प्रोसेसिंग, तथा बगरू-सांगानेर की पारंपरिक ब्लॉक प्रिंटिंग को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान और निवेश मिलने की संभावना बढ़ सकती है। इससे राज्य में रोजगार और निर्यात दोनों को गति मिलने की उम्मीद है।