नई दिल्ली

ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम से बांसवाड़ा में बनेगी बिजली

ऑस्ट्रेलिया के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते के तहत प्रशासनिक व्यवस्था को अंतिम रूप देने के बाद अब भारत को दीर्घकालिक आधार पर ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की आपूर्ति का रास्ता साफ हो गया है
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Rawatbhata nuclear reactor
राजस्थान का रावतभाटा परमाणु रिएक्टर (File Photo)

नई दिल्ली। भारत ने स्वच्छ ऊर्जा और ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। ऑस्ट्रेलिया के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते के तहत प्रशासनिक व्यवस्था को अंतिम रूप देने के बाद अब भारत को दीर्घकालिक आधार पर ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की आपूर्ति का रास्ता साफ हो गया है। यह सिर्फ ईंधन आयात का समझौता नहीं है, बल्कि 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना का अहम आधार भी माना जा रहा है।

दरअसल, भारत की बिजली जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। सौर और पवन ऊर्जा के विस्तार के बावजूद इन स्रोतों की सबसे बड़ी चुनौती उनकी अनियमित उपलब्धता है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा 24 घंटे उपलब्ध रहने वाली बेसलोड बिजली का स्रोत बन सकती है। भारत के अधिकांश प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर प्राकृतिक यूरेनियम पर चलते हैं। घरेलू उत्पादन सीमित होने के कारण आयात पर निर्भरता बनी रहती है। ऑस्ट्रेलिया, जिसके पास दुनिया का एक-तिहाई से अधिक यूरेनियम भंडार है, अब भारत के लिए दीर्घकालिक और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता बन सकता है।

बांसवाड़ा बनेगा नया परमाणु हब राजस्थान के माही

बांसवाड़ा परमाणु ऊर्जा परियोजना में 700-700 मेगावाट क्षमता के चार स्वदेशी प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर स्थापित किए जाने हैं। कुल 2800 मेगावाट क्षमता वाली यह परियोजना देश की सबसे बड़ी नई परमाणु परियोजनाओं में शामिल है। ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाला प्राकृतिक यूरेनियम इन और अन्य स्वदेशी रिएक्टरों के लिए दीर्घकालिक ईंधन सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। गौरतलब है कि वर्तमान में देश में स्थापित परमाणु ऊर्जा क्षमता 8,780 मेगावाट है, जिसमें 24 परमाणु ऊर्जा संयंत्र शामिल हैं ।

रावतभाटा की रफ्तार फिर धीमी

जहां नई परियोजनाओं की तैयारी तेज हो रही है, वहीं राजस्थान परमाणु बिजलीघर (आरएपीपी) की 700 मेगावाट क्षमता वाली आठवीं इकाई समय सीमा से पीछे चल रही है। परियोजना को पूरा करने की समय-सीमा लगभग एक वर्ष बढ़ानी पड़ी है। सूत्रों ने बताया कि भारी उपकरणों की आपूर्ति, सीमित घरेलू वेंडर इकोसिस्टम और विशेषीकृत इंजीनियरिंग उपकरणों की उपलब्धता में देरी इसका प्रमुख कारण है।

निर्माणाधीन और नई परियोजनाओं पर टिका 100 गीगावाट का लक्ष्य

भारत में इस समय 13,600 मेगावाट क्षमता के 18 परमाणु रिएक्टर निर्माणाधीन हैं। इनमें राजस्थान के रावतभाटा -8, तमिलनाडु के कुडनकुलम-3, 4, 5 और 6, हरियाणा के गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजना, कर्नाटक के कैगा-5 और 6 तथा तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर प्रमुख हैं।

प्री-प्रोजेक्ट चरण में

प्री-प्रोजेक्ट चरण में भी कई बड़ी परियोजनाएं हैं। इनमें राजस्थान के माही-बांसवाड़ा (4 गुणा 700 मेगावाट), कर्नाटक के कोव्वाडा (आंध्र प्रदेश) में छह बड़े रिएक्टर, महाराष्ट्र के जैतापुर में छह ईपीआर रिएक्टर, मध्यप्रदेश के चुटका (2 गुणा 700 मेगावाट) व हरियाणा के गोरखपुर के अगले चरण शामिल हैं। इन परियोजनाओं के पूरा होने पर देश की परमाणु क्षमता में कई गुना वृद्धि होगी।

छोटे रिएक्टरों पर बड़ा दांव, 20 हजार करोड़ का निवेश

केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट 2025-26 में स्वदेशी स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (एसएमआर) कार्यक्रम के लिए 20,000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। इसका उपयोग एसएमआर के अनुसंधान, डिजाइन, विकास और तैनाती में किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी एसएमआर विकसित कर उन्हें चालू करना है। 300 मेगावाट तक क्षमता वाले ये छोटे परमाणु रिएक्टर पारंपरिक बड़े संयंत्रों की तुलना में कम समय और कम लागत में स्थापित किए जा सकते हैं। इन्हें उद्योगों, डेटा सेंटरों, इस्पात एवं सीमेंट संयंत्रों तथा दूरदराज के क्षेत्रों में 24 घंटे निर्बाध बिजली उपलब्ध कराने के लिए उपयुक्त माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह कार्यक्रम सफल रहा तो भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि भविष्य में स्वदेशी एसएमआर तकनीक के निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।

Updated on:
17 Jul 2026 04:10 pm
Published on:
17 Jul 2026 04:10 pm