
Delhi rain news: कहने को तो दिल्ली देश की राजधानी है, लेकिन मंगलवार को हुई बारिश ने एक बार फिर इसे 'सपनों की नगरी' से 'सड़कों पर समंदर' बना दिया। मॉनसून की तैयारियों को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाले विभागों की हकीकत महज कुछ घंटों की बारिश में बह गई। नतीजा? पूरी दिल्ली रेंगने लगी, गाड़ियां पानी में तैरने लगीं और दफ्तर पर निकले लोग घंटों ट्रैफिक में फंसे रहे।
इस बारिश में सबसे ज्यादा नुकसान ईस्ट ऑफ कैलाश में देखने को मिला। यहां एक भारी-भरकम सफेदा का पेड़ अचानक गिर गया। इसकी चपेट में दो कारें आ गईं, जिनमें से एक तो ब्रांड न्यू 'मर्सिडीज' थी। कार की हालत देखकर ही मालिक का दर्द समझा जा सकता है।
दूसरी तरफ, गाजीपुर मुर्गा मंडी का नजारा तो सोशल मीडिया पर वायरल होने जैसा था। यहां घुटनों तक भरे पानी के बीच ट्रैफिक पुलिस के जवान खुद सड़क पर उतरे और अपनी ड्यूटी निभाते हुए जाम खुलवाया। वहीं सदर बाजार के तेलीवाड़ा में तो पानी इतना ज्यादा था कि कई लोगों की गाड़ियां बीच रास्ते में ही बंद हो गईं, जिसके बाद लोग धक्का लगाते नजर आए।
झंडेवालान मंदिर के सामने रिंग रोड का बुरा हाल था। पानी भरने की वजह से श्रद्धालुओं और राहगीरों को भारी किल्लत झेलनी पड़ी। लोगों ने गुस्से में दिल्ली ट्रैफिक पुलिस को खूब ट्वीट और शिकायतें कीं। संगम विहार के जगतपुर-वजीराबाद रोड का हाल तो और भी बुरा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन ने सड़क तो चमका दी, लेकिन पानी निकलने का कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा।
इसके अलावा, पूर्वी दिल्ली का पांडव नगर अंडरपास तो जैसे तालाब में तब्दील हो गया, जिससे गाड़ियों की एंट्री ही बंद करनी पड़ी। एनएच-9 और खिचड़ीपुर के पास भी सर्विस लेन पूरी तरह डूब चुकी थी।
ट्रैफिक इंडेक्स के आंकड़े डराने वाले हैं। मंगलवार को दिल्ली-एनसीआर के करीब 335 पॉइंट्स पर भयंकर जाम देखा गया। अगर इस पूरे जाम को नापा जाए, तो यह लगभग 200 किलोमीटर से ज्यादा लंबा था। आम दिनों के मुकाबले ट्रैफिक 30 फीसदी ज्यादा रहा। हालत यह थी कि 15 मिनट में गाड़ियां साढ़े चार किलोमीटर की दूरी भी तय नहीं कर पा रही थीं।
एनएच-48 पर गुरुग्राम बॉर्डर से लेकर महिपालपुर और धौला कुआं तक गाड़ियों की मील लंबी कतारें लगी थीं। प्रगति मैदान टनल, तीस हजारी, पीतमपुरा, जनकपुरी और नोएडा-दिल्ली डीएनडी रूट पर भी लोग एक से डेढ़ घंटे तक स्टीयरिंग थामे सिर्फ अपनी बारी का इंतजार करते दिखे। साफ है कि दिल्ली की ड्रेनेज व्यवस्था 'बीमार' हो चुकी है, और इसका इलाज कब होगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।