देश के हालिया चुनावी रुझानों में एक दिलचस्प पैटर्न उभर रहा है। जिन राज्यों में मतदान प्रतिशत रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा, वहां नतीजे अक्सर स्पष्ट और कई बार एकतरफा रहे हैं। खास तौर पर पिछले कुछ वर्षों में हाई टर्नआउट को केवल बदलाव की लहर नहीं, बल्कि मजबूत जनादेश और सत्ताधारी दल के पक्ष में एकजुट वोटिंग के संकेत के रूप में भी देखा जाने लगा है।
नई दिल्ली। देश के हालिया चुनावी रुझानों में एक दिलचस्प पैटर्न उभर रहा है। जिन राज्यों में मतदान प्रतिशत रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा, वहां नतीजे अक्सर स्पष्ट और कई बार एकतरफा रहे हैं। खास तौर पर पिछले कुछ वर्षों में हाई टर्नआउट को केवल बदलाव की लहर नहीं, बल्कि मजबूत जनादेश और सत्ताधारी दल के पक्ष में एकजुट वोटिंग के संकेत के रूप में भी देखा जाने लगा है।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में इस बार करीब 9 फीसदी तक मतदान बढ़ने के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या ज्यादा वोटिंग का मतलब अब सत्ता विरोध नहीं, बल्कि सत्ता के पक्ष में समेकन है। पिछले तीन साल के विधानसभा चुनावों का विश्लेषण बताता है कि कई मामलों में बंपर वोटिंग से मुकाबला सिमट गया और विजेता को स्पष्ट बढ़त मिली। बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में रिकॉर्ड मतदान बढ़ोतरी के साथ सत्ताधारी गठबंधन ने एकतरफा जीत दर्ज की। झारखंड में करीब 3 फीसदी वोटिंग बढ़ने पर सत्ता पक्ष को बढ़त मिली, वहीं अरुणाचल प्रदेश और हरियाणा में मामूली उतार-चढ़ाव के बावजूद सत्ता बरकरार रही। हालांकि ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में हल्की बढ़ोतरी के बावजूद सत्ता परिवर्तन भी हुआ, जो इस ट्रेंड में अपवाद की ओर इशारा करता है। इससे साफ है कि ज्यादा मतदान अब हर बार एंटी-इंकंबेंसी का संकेत नहीं रहा, बल्कि कई बार यह सरकार के पक्ष में मजबूत समर्थन के रूप में सामने आता है।
बेहतर चुनावी प्रबंधन मतदाता जागरूकता अभियान, कल्याणकारी योजनाओं का असर और बूथ स्तर तक राजनीतिक दलों की सक्रियता, हाई टर्नआउट के प्रमुख कारण हैं। जब सत्ताधारी दल अपने समर्थकों को बड़े पैमाने पर मतदान केंद्र तक लाने में सफल होता है, तो इसका सीधा फायदा उसे नतीजों में दिखता है। * बंगाल की अपनी कहानी पश्चिम बंगाल में मतदान बढ़ने का असर अलग-अलग दौर में अलग रहा है। 1996 और 2006 में करीब 6 फीसदी वोटिंग बढ़ने के बावजूद वाम मोर्चा सत्ता में बना रहा। लेकिन 2011 में महज 3 फीसदी की बढ़ोतरी ने 34 साल पुरानी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया और ममता बनर्जी के नेतृत्व में बदलाव आया।
तमिलनाडु में हाई टर्नआउट अक्सर सत्ता परिवर्तन से जुड़ा रहा है। 2011 में 7.73 फीसदी मतदान बढ़ने पर करुणानिधि सरकार को हार का सामना करना पड़ा, जबकि 2006 में 11.49 फीसदी बढ़ोतरी ने जयललिता सरकार की विदाई तय की। हालांकि 2021 में मामूली गिरावट के बावजूद सत्ता परिवर्तन हुआ, जो बताता है कि यहां समीकरण हमेशा सीधे नहीं रहते।
| राज्य | मतदान बढ़ोतरी (%) | परिणाम |
| बिहार | 9.96 | सत्ताधारी एनडीए |
| महाराष्ट्र | 5.13 | सत्ताधारी एनडीए |
| झारखंड | 2.96 | सत्ता पक्ष को बढ़त |