केरल में ऐतिहासिक जीत के बाद खुली कांग्रेस की नई ‘केरल फाइल्स’ सिर्फ सरकार गठन की कहानी नहीं बता रहीं, बल्कि पार्टी की बदलती राजनीतिक सोच और रणनीति का संकेत भी दे रही हैं। कांग्रेस ने वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब केवल आलाकमान से नजदीकी, दिल्ली दरबार में लॉबिंग या सार्वजनिक दबाव बनाकर नेतृत्व हासिल करना आसान नहीं होगा। पार्टी अब ऐसे चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी में दिख रही है, जिनकी पकड़ सिर्फ सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि जनता और कार्यकर्ताओं के बीच भी मजबूत हो। यानी कांग्रेस का नया फॉर्मूला साफ है—नेतृत्व उसी को मिलेगा, जो जमीन पर भरोसेमंद और संगठन में स्वीकार्य होगा।
नई दिल्ली। केरल में ऐतिहासिक जीत के बाद खुली कांग्रेस की नई ‘केरल फाइल्स’ सिर्फ सरकार गठन की कहानी नहीं बता रहीं, बल्कि पार्टी की बदलती राजनीतिक सोच और रणनीति का संकेत भी दे रही हैं। कांग्रेस ने वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब केवल आलाकमान से नजदीकी, दिल्ली दरबार में लॉबिंग या सार्वजनिक दबाव बनाकर नेतृत्व हासिल करना आसान नहीं होगा। पार्टी अब ऐसे चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी में दिख रही है, जिनकी पकड़ सिर्फ सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि जनता और कार्यकर्ताओं के बीच भी मजबूत हो। यानी कांग्रेस का नया फॉर्मूला साफ है—नेतृत्व उसी को मिलेगा, जो जमीन पर भरोसेमंद और संगठन में स्वीकार्य होगा।
दरअसल, केरल में सतीशन को मुख्यमंत्री पद के लिए चुनना कांग्रेस के पारंपरिक सत्ता समीकरणों से अलग माना जा रहा है। अब तक कई मौकों पर आलाकमान की पसंद, दिल्ली में सक्रिय लॉबिंग और गुटीय ताकत नेतृत्व तय करती रही है। लेकिन इस बार पार्टी ने विधायकों की संख्या और दिल्ली की पैरवी से आगे बढ़कर कार्यकर्ताओं और जनता के बीच स्वीकार्यता को अहम माना। कांग्रेस के रणनीतिकार इसे पार्टी के लिए “नए राजनीतिक संकेत” के तौर पर देख रहे हैं। उनका मानना है कि इस फैसले से कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच यह संदेश जाएगा कि मेहनत, जनाधार और संगठनात्मक स्वीकार्यता का सम्मान हो सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस ने कई राज्यों में नेतृत्व को लेकर उठे असंतोष की बड़ी राजनीतिक कीमत चुकाई है। मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की नाराजगी ने कांग्रेस सरकार गिरा दी, जबकि राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच लंबा टकराव सरकार के पूरे कार्यकाल पर भारी पड़ा। पंजाब में नेतृत्व परिवर्तन और आंतरिक खींचतान ने चुनावी नुकसान पहुंचाया, वहीं छत्तीसगढ़ में भी सत्ता और संगठन के बीच संतुलन को लेकर लगातार चर्चा होती रही। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इन घटनाओं ने कांग्रेस नेतृत्व को यह समझाया कि केवल बड़े चेहरे या दिल्ली में मजबूत पकड़ रखने वाले नेताओं पर निर्भर राजनीति लंबे समय तक संगठन को स्थिर नहीं रख सकती। ऐसे में केरल मॉडल के जरिए पार्टी अब संगठन आधारित और जनाधार वाले नेतृत्व को प्राथमिकता देने का संकेत दे रही है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बाद संगठन में के.सी. वेणुगोपाल को सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। राहुल गांधी के करीबी होने के कारण भी उनका कद लगातार मजबूत माना जाता रहा है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री पद की दौड़ में खुद आगे आने के बजाय सतीशन के नाम पर सहमति बनने देना उनके राजनीतिक कद को और बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है। पार्टी के भीतर इसे संगठनात्मक अनुशासन और सामूहिक नेतृत्व की मिसाल के तौर पर भी देखा जा रहा है। इससे वेणुगोपाल की छवि केवल ताकतवर संगठन नेता की नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं में सम्मानित और संतुलन साधने वाले चेहरे की भी बन सकती है।