नई दिल्ली

एक खेत, दो कमाई: फसल भी और सौर बिजली भी

इस तकनीक में सोलर पैनल खेतों के ऊपर ऊंचे ढांचे पर लगाए जाते हैं, ताकि नीचे खेती जारी रहे और ऊपर से बिजली बनती रहे। इसमें एक मेगावाट क्षमता के प्लाटं को लगाने के लिए करीब चार एकड़ के खेत की जरूरत होगी। सरकार ने खेतों के जरिए 5 गीगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा है।
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Updated: 26 Oct 2026, 10:08 AM IST
Agricalture Solar panel


अभिषेक सिंघल

नई दिल्ली। खेतों में अब फसल के साथ बिजली उत्पादन भी किसानों की आमदनी बढ़ाने का जरिया बन सकता है। केंद्र सरकार एग्रीवोल्टिक्स (जमीन का खेती और बिजली उत्पादन के लिए दोहरा उपयोग) को बढ़ावा देने के लिए नई नीति पर काम कर रही है। इस तकनीक में सोलर पैनल खेतों के ऊपर ऊंचे ढांचे पर लगाए जाते हैं, ताकि नीचे खेती जारी रहे और ऊपर से बिजली बनती रहे। इसमें एक मेगावाट क्षमता के प्लाटं को लगाने के लिए करीब चार एकड़ के खेत की जरूरत होगी। सरकार ने खेतों के जरिए 5 गीगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा है। केन्द्रीय नवीन एवं नवीकरणीय उर्जा मंत्रालय पीएम कुसुम-2 योजना में खेतों में बिजली उत्पादन संबधी प्रावधानों को भी जोड़ने जा रहा है और इसे जल्द ही केबिनेट को मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

खेती की जमीन से दोहरा लाभ

सामान्यतया सौर उर्जा के लिए ऐसी जमीन को तरजीह दी जाती थी जिसमें खेती की संभावनाएं कम हों लेकिन एग्रीवोल्टिक्स की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पैनल्स को ऐसी ऊंचाई पर लगाया जा रहा है जिससे किसान पैनलों के नीचे उपयुक्त फसल उगा सकता है, सिंचाई और अन्य कृषि कार्यों के लिए बिजली इस्तेमाल कर सकता है और अतिरिक्त बिजली बेचकर कमाई का दूसरा रास्ता बना सकता है। इसके चलते सालाना एक एकड़ जमीन से 60 हजार से लेकर एक लाख तक की कमाई हो सकती है। हालांकि यह फसल उत्पादन और बिजली उत्पादन के अनुसार कम ज्यादा हो सकती है।

देश में करीब 5 करोड़ हेक्टयेर में है संभावना

सरकार के अनुमान के अनुसार देश की करीब 16 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र तकनीकी रूप से एग्रीवोल्टेइक के लिए उपयुक्त हो सकता है। महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में इसकी बड़ी संभावनाएं हैं।

लागत सबसे बड़ी चुनौती

एग्रीवोल्टिक्स में पैनलों को ऊंचाई पर लगाने और खेती के लिए पर्याप्त जगह छोड़ने के कारण सामान्य सौर परियोजनाओं के मुकाबले लागत करीब 25 से 30 प्रतिशत अधिक हो सकती है। इससे उत्पादित होने वाली बिजली की लागत भी ज्यादा हो सकती है। एक अनुमान के अनुसार एग्रीवोल्टेइक सिस्टम से प्रति यूनिट लागत 3.20 रूपए हो सकती है जबकि परंपरागत जमीन पर लगने वाले सोलर प्लांट से यह करीब 2.60 रूपए प्रति यूनिट रहती है। हालांकि केन्द्र सरकार पीएम कुसुम-2 योजना में इसके लिए विशेष प्रावधान करने जा रही है। अभी केन्द्र स्टैंड अलोन सोलर पम्प के लिए 30 प्रतिशत तक की सब्सिडी दे रहा है। वहीं राज्य भी इसमें और सब्सिडी देते हैं। साथ ही कंपोनेंट ए के तहत राज्य निश्चित दर पर बिजली खरीदते हैं वहीं केन्द्र उसमें प्रति यूनिट सब्सिडी सहायता देता है।

फसल के हिसाब से होगा पैनलों का डिजाइन

एग्रीवोल्टेइक प्लांट में कोण, ऊंचाई के चलते खेत में छाया का आकलन कर फसल की बुवाई का चयन करना होगा। प्लांट को भी खेत के अनुकूल फसल की आवश्यकता के अनुसार मोडिफाई करना होगा। हर फसल को एक जैसी धूप की जरूरत नहीं होती। पालक जैसी पत्तेदार सब्जियों, हल्दी और अदरक व कुछ अन्य फसलों में नियंत्रित छाया फायदेमंद हो सकती है। टमाटर, मिर्च, दालें और अन्य बागवानी वाली फसलों पर भी परीक्षण किया जा सकता है। वहीं गेहूं, मक्का, और दूसरी अधिक धूप की आवश्यकता वाली फसलों की पैदावार ज्यादा छाया में घट सकती है।

किस तरह के हो सकते हैं एग्रीवोल्टेइक प्लांट्स

  • एलिवेटेड सौर पैनल: सौर पैनलों को ऊंचे ढांचों पर लगाया जाता है, ताकि उनके नीचे खेती की जा सके। इससे कृषि मशीनों के इस्तेमाल और फसलों तक पर्याप्त धूप पहुँचने में मदद मिलती है।
  • फसलों की कतारों के बीच सौर पैनल: सौर पैनलों को फसलों की कतारों के बीच लगाया जाता है। इससे जमीन का बेहतर उपयोग होता है और फसलों को आंशिक छाया मिलती है।
  • सौर पैनल वाले ग्रीनहाउस: ग्रीनहाउस की छत या दीवारों पर सौर पैनल लगाए जाते हैं। इससे बिजली पैदा करने के साथ पौधों के लिए तापमान और नमी को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

-यदि देश की कुल कृषि योग्य भूमि का दस प्रतिशत यानी 16 मिलियन हेक्टयर पर भी एग्रीवोल्टेइक्स स्थापित हो जाएं तो इससे 12775 टीडब्ल्यूएच बिजली उत्पादित होगी जो 2050 में भारत की कुल बिजली की मांग 5250-10020 टीडब्ल्यूएच से भी ज्यादा होगी।
-विश्व में 18.4 गीगावाट की स्थापित क्षमता है एग्रीवोल्टेइक्स की
-भारत में 36 एग्रीवोल्टेइक प्रोजेक्ट्स संचालित हैं जिनकी स्थापित क्षमता 37.54 मेगावाट है। इसके साथ ही दस अन्य पाइलट प्रोजेक्ट अभी विकसित हो रहे हैं।
-भारत की एग्रीवोल्टेइक्स की संभावित क्षमता 3,000 गीगावाट से 14000 गीगावाट तक है।

आवश्यक नियामकीय प्रावधान पर विचार

केन्द्र छोटी जोतों वाले किसान एक साथ मिल कर सहकारी आधार पर इससे जुड़ सकें इसके लिए आवश्यक कानूनी और नियामकीय प्रावधान पर भी विचार कर रहा है। कृषि मंत्रालय, सहकारिता मंत्रालय और एमएनआरई इसके लिए अलग अलग स्तरों पर विचार कर रहे हैं। वहीं केन्द्र इसमें सहायता के लिए अलग अलग मंत्रालयों में योजनाओं को एकीकृत स्वरूप में लाने पर भी विचार कर रहा है।

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26 Oct 2026, 10:08 AM IST
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