सिंधु की पश्चिमी नदियों का पानी राजस्थान पहुंचने का सपना जल्द ही साकार होगा। पहलगाम हमले के विरोध में निलम्बित सिंधु जल संधि के बाद से भारत ने सिंधु की पश्चिमी नदियों में से एक चेनाब के अतिरिक्त पानी को ब्यास रिवर सिस्टम में मोड़ने के लिए काम शुरू कर दिया है। इसके लिए चेनाब की सहायक नदी चंद्रा से पानी को हिमाचल में लाहौल घाटी में एक सुरंग के जरिए मोड़ा जाएगा। इसके लिए 2352 करोड़ की परियोजना पर काम हो रहा है। ब्यास रिवर सिस्टम में पानी आने पर यह राजस्थान तक पहुंचेगा।वहीं जम्मू के पास सलाल बांध में गाद को जाने से रोकने के लिए 268 करोड़ से एक नहर बनाने की परियोजना पर भी काम होगा
नई दिल्ली। सिंधु की पश्चिमी नदियों का पानी राजस्थान पहुंचने का सपना जल्द ही साकार होगा। पहलगाम हमले के विरोध में निलम्बित सिंधु जल संधि के बाद से भारत ने सिंधु की पश्चिमी नदियों में से एक चेनाब के अतिरिक्त पानी को ब्यास रिवर सिस्टम में मोड़ने के लिए काम शुरू कर दिया है। इसके लिए चेनाब की सहायक नदी चंद्रा से पानी को हिमाचल में लाहौल घाटी में एक सुरंग के जरिए मोड़ा जाएगा। इसके लिए 2352 करोड़ की परियोजना पर काम हो रहा है। ब्यास रिवर सिस्टम में पानी आने पर यह राजस्थान तक पहुंचेगा। वहीं जम्मू के पास सलाल बांध में गाद को जाने से रोकने के लिए 268 करोड़ से एक नहर बनाने की परियोजना पर भी काम होगा। दोनों परियोजनाएं कुल 2620 करोड़ की हैं। सूत्रों के अनुसार इसके लिए एनटीपीसी को जिम्मेदारी दी गई है।
हिमाचल प्रदेश में लाहौल घाटी में चेनाब की सहायक नदी चंद्रा हाइड्रोलिक ढांचे और सुरंग के जरिए ब्यास बेसिन में जोड़ा जाएगा। पीर पंजाल पर्वत के नीचे रोहतांग में अटल टनल के ऊत्तरी छोर के निकट कोस्कर गांव के पास से पानी को डाइवर्ट किया जाएगा। चेनाब –ब्यास लिंक टनल करीब 8.7 किलोमीटर लम्बी होगी। इस परियोजना में लाहौल घाटी में 19 मीटर ऊंचा बांध भी बनेगा और इससे हिमाचल के लिए 4000 मेगावाट की बिजली भी बनेगी। और इससे पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान को फायदा होगा। ब्यास के पानी को राजस्थान पहुंचाने के लिए पहले से ही नहरी तंत्र मौजूद है।
जम्मू कश्मीर में जम्मू क्षेत्र में रेसी तहसील में चेनाब नदी पर सलाल बांध में गाद को बाईपास करने के लिए 268 करोड़ की नहर का निर्माण होगा। यह रेतीले पानी को बांध में जाने से रोक कर अलग करेगी। गौरतलब है कि संधि के निलम्बन के बाद सलाल बांध से गाद निकाले जाने का काम सबसे पहले प्राथमिकता से पूरा किया गया था। इस प्रस्तावित लिंक टनल के जरिए बिजली बनने में तेजी आएगी क्योंकि पानी की रेत को सुरंग के जरिए अलग किया जा चुका होगा। इससे पानी की उपलब्धता भी बढ़ेगी।
2029 से पहले सिंधु बेसिन का पानी चेनाब- ब्यास लिंक के जरिए राजस्थान तक पहुंचाने की तैयारियां की जा रही हैं। इस नदी इंटरलिंकिंग से सिंधु की पश्चिमी नदियों का पानी को राजस्थान तक पहुंचाया जाएगा। इसके लिए जम्मू कश्मीर, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में 13 नहरी तंत्रों को आपस में जोड़ा जाएगा। पश्चिमी नदियों में भारत को 3.6 एमएएफ पानी का उपयोग करना है। पिछले दिनों केन्द्र के वरिष्ठ मंत्रियों ने परियोजना का रिव्यू कर इसे 2029 से पहले पूरा करने के निर्देश दिए थे। अब इसके लिए कार्यादेश जारी हो गए हैं। इससे चेनाब का पानी इंदिरा गांधी नहर के जरिए राजस्थान के विभिन्न जिलों तक पहुंच सकेगा।
चेनाब पर बगलीहार, सलाल और दुलहस्ती हाइड्रोपावर परियोजनाओं से गाद निकालने का काम पूरा हो गया है। वहीं नदी जल प्रवाह योजनाओं के रूप में चेनाब पर ही पाकुलदुल 167 मीटर की ऊंचाई का भारत सबसे ऊंचा बांध बन रहा है। इसकी क्षमता 1000 मेगावाट बिजली उत्पादन की है। किरू 135 मीटर ऊंचा बांध, 624 मेगावाट क्षमता, क्वार 109 मीटर ऊंचा बांध, 540 मेगावाट क्षमता, रात्ले 133 मीटर ऊंचा बांध, क्षमता 850 मेगावाट बिजली उत्पादन की है। इनमें से पाकुलदुल और किरू इसी साल के अंत में पूरे होंगे। वहीं दो अन्य का काम भी तेज कर दिया गया है। इसके अलावा सावलकोटे 1856 मेगावाट, बुरसर 800 मेगावाट, किर्ताई 1- 390 मेगावाट, किर्ताई 2930 मेगावाट भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इसके साथ ही चेनाब पर ही दुलहस्ती 2 परियोजना को भी हरी झंडी मिल गई है।
रावी नदी में भारत के हिस्से का काफी पानी अब पाकिस्तान जाने से रोका जा रहा है। सिंधु नदी बेसिन की पूर्वी नदी रावी पर पंजाब के पठानकोट जिले में शाहपुर कंडी बांध के जरिए पानी को कठुआ के उझ बैराज की तरफ मोड़ने की परियोजना भी पिछले दिनों पूरी हो गई है। इस पानी को अब पंजाब और जम्मू कश्मीर में सिंचाई के काम में लिया जाएगा। अब तक रावी नदी का अधिकांश पानी जम्मू-कश्मीर और पंजाब की सीमा से होकर पाकिस्तान चला जाता था। अब शाहपुर कंडी डैम परियोजना से 206 मेगावाट बिजली उत्पादन भी होगा।
पूर्वी नदियां- सतलुज, ब्यास, रावी का वार्षिक प्रवाह करीब 33 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ)
पश्चिमी नदियां- सिंधु, झेलम और चेनाब का औसत प्रवाह करीब 135 मिलियन एकड़ फीट एमएएफ
सर्दियों में जम जाती है चंद्रा नदी, गर्मी में आता है उफान- लाहौल की चंद्रा नदी सर्दियों में पूरी तरह जम जाती है। गर्मियों के दौरान मई से सितंबर के मात्र पांच महीनों में ग्लेशियर पिघलने के दौरान इस नदी में तेजी से पानी आता है। गर्मियों के इन्हीं पांच महीनों में टनल के जरिए चिनाब का पानी ब्यास नदी में डाला जाएगा।
ब्यास नदी में आने वाला पानी हरिके बैराज पहुंचेगा। यहां से इंदिरा गांधी नहर के जरिए राजस्थान
भारत ने सिंधु जल संधि को निलम्बित किया है। अब मानवीय स्थितियों के अतिरिक्त हम पाकिस्तान के साथ डेटा साझा नहीं करते हैं। हम पानी के अपने हिस्से का उपयोग करने के लिए ज्यादा सजग हो गए हैं और इससे जुड़ी परियोजनाओं में तेजी आई है। इसके ठोस परिणाम अगले कुछ वर्षों में दिखेंगे।
-डॉ. यूके सिंह, सीमा जल प्रबंधन विशेषज्ञ, मनोहर पर्रिकर आईडीएसए दिल्ली।