पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार कांग्रेस एक जटिल संतुलन साधने की कोशिश में है। एक तरफ उसे राज्य में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन और संगठन को फिर से स्थापित करना है, तो दूसरी ओर सत्ताधारी ममता बनर्जी के साथ रिश्तों की डोर भी ढीली नहीं पड़ने देना चाहती। यही वजह है कि पार्टी का चुनावी रुख इस बार चुनिंदा आक्रामकता और संयमित सहयोग के बीच झूलता नजर आ रहा है।
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार कांग्रेस एक जटिल संतुलन साधने की कोशिश में है। एक तरफ उसे राज्य में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन और संगठन को फिर से स्थापित करना है, तो दूसरी ओर सत्ताधारी ममता बनर्जी के साथ रिश्तों की डोर भी ढीली नहीं पड़ने देना चाहती। यही वजह है कि पार्टी का चुनावी रुख इस बार चुनिंदा आक्रामकता और संयमित सहयोग के बीच झूलता नजर आ रहा है।
कांग्रेस इस बार 292 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। ऐसे में पार्टी को कुछ सीट मिलने के साथ वोट प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है। वहीं राज्यभर में व्यापक अभियान के बजाय कुछ खास इलाकों पर फोकस करने की रणनीति अपनाई है। पार्टी का मानना है कि सीमित संसाधनों के बीच वही सीटें प्राथमिकता बनें, जहां संगठन अभी भी सक्रिय है और मुकाबले की स्थिति बन सकती है।
कांग्रेस का मुख्य फोकस मालदा, मुर्शिदाबाद, कोलकाता, हुगली, रायगंज, उत्तर दिनाजपुर बीरभूम जैसे इलाकों तक सीमित रहा। इन इलाकों में कांग्रेस का सामाजिक और राजनीतिक आधार अब भी बचा हुआ है। कुछ सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों को पिछले चुनाव अच्छे वोट भी मिले थे। कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक, खासकर अल्पसंख्यक और ग्रामीण मतदाताओं को फिर से संगठित करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी ने बंगाल प्रदेश अध्यक्ष सुभांकर सरकार की सीट श्रीरामपुर और वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी के गृह जिले मुर्शिदाबाद जाकर प्रचार किया। राहुल ने यहां सभाएं सिर्फ और सिर्फ पार्टी ने अपनी लीडरशिप बचाने के लिए की। गौरतलब है कि राहुल ने यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का एक बार नाम लेकर हमला किया, लेकिन उनके भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा का कई बार निशाना साध अपना राजनीतिक संदेश दे दिया।
दिलचस्प यह है कि कांग्रेस उन सीटों पर ज्यादा आक्रामक नहीं दिख रही, जहां तृणमूल कांग्रेस का सीधा मुकाबला भाजपा से है। पार्टी नेतृत्व नहीं चाहता कि राज्य में आक्रामक रुख अपनाकर वह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठजोड़ की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाए।
पार्टी के रणनीतिकारों का कहना है कि हालांकि, इस दोहरी रणनीति के अपने जोखिम भी हैं। इससे कांग्रेस की स्पष्ट पहचान कमजोर पड़ सकती है। मतदाताओं के सामने यह सवाल खड़ा हो सकता है कि पार्टी आखिरकार किसके खिलाफ लड़ रही है और किसके साथ खड़ी है। बंगाल में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने संगठन को फिर से खड़ा करे और मतदाताओं के बीच अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए। लेकिन मौजूदा हालात में पार्टी को हर कदम फूंक-फूंककर रखना पड़ रहा है।