-राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस समारोह में बोले उपराष्ट्रपति
नई दिल्ली. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने बांग्लादेश का नाम लिए बिना कहा कि हमारे पड़ोस में हिंदुओं की दुर्दशा का सबसे निराशाजनक पहलू तथाकथित नैतिक उपदेशकों, मानवाधिकारों के संरक्षकों की गहरी चुप्पी है। वे पूरी तरह से बेनकाब हो चुके हैं। वे ऐसी चीज़ों के भाड़े के सिपाही हैं जो मानवाधिकारों के बिल्कुल विपरीत है।
उपराष्ट्रपति ने यह बातें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के स्थापना दिवस समारोह में कही। उन्होंने कहा कि हमारे पड़ोस में लडक़े, लड़कियों और महिलाओं के साथ बर्बरता, यातना, दर्दनाक घटनाएं हुई है। हमारे धार्मिक स्थलों पर अपवित्र किया गया। हम बहुत सहिष्णु हैं और इस तरह के उल्लंघनों के प्रति बहुत सहिष्णु रहे हैं। यह उचित नहीं है। उन्होंने देश के सभी लोगों से इस पर गंभीरता से सोचने और विचार करने का आह्वान किया। धनखड़ ने कहा कि एक के बाद एक कई घटनाओं से इस बात के सबूत मिल रहे हैं कि डीप स्टेट समूह उभरती हुई शक्तियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। ऐसा लगता है कि वे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में सभ्यतागत उन राज्यों के उदय को पचा नहीं पा रहे हैं जो अपनी पहचान का दावा करते हैं।
उपराष्ट्रपति ने भुखमरी सूचकांक पर निशाना साधते हुए कहा कि सूचकांक बनाने और दुनिया में सभी को रैंक करने का अधिकार है। इस प्रयास में शाही अहंकार की बू आती है। किसी देश को बदनाम करने के लिए, उनके पास देशों की एक सूची है। धनखड़ ने सूचकांक बनाने वालों को चुनौती दी कि अगर कोई दिव्य आत्मा, दिव्य पारिस्थितिकी तंत्र है, तो वे भारत में आएं। कोविड के दौरान चुनौतियों का सामना करते हुए हमने सैकड़ों अन्य देशों की सहायता की। दुनिया में जब भी लोगों को निकालने की आवश्यकता या भूकंप के रूप में कोई संकट आया है, तो हमारा देश हमेशा आगे आया है। कोरोना महामारी के दौरान सरकार ने जाति और पंथ की परवाह किए बिना 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया।
धनखड़ ने कहा कि भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु एक आदिवासी महिला है, जिन्होंने हर तरह की चुनौतियों का सामना किया। वहीं छह दशक बाद ऐतिहासिक रूप से तीसरी बार प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी एक पिछड़ी जाति से आते हैं। उन्होंने पूर्ण बहुमत के साथ अपने सरकार के पहले कार्यकाल में देश की तस्वीर ही बदल दी थी। उन्हें बचपन की एक ही याद है कि किस तरह ट्रेन आने पर लोगों को चाय पिलाते थे, वह भी पैसे कमाने की जल्दी में।
धनखड़ ने कहा कि भारत, जिसे लंबे समय से मानवाधिकारों का संरक्षक माना जाता रहा है, उसने क्रूर विभाजन, दमनकारी आपातकाल और 1984 के भयानक दंगों का सामना किया है। ये दर्दनाक घटनाएं नागरिक स्वतंत्रता की नाजुकता और मानवीय गरिमा की सतर्कतापूर्वक रक्षा करने की अनिवार्यता की गंभीर याद दिलाती हैं।