तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम के बाद अब राष्ट्रीय राजनीति का परिदृश्य बदलने की कवायद भी अंदरखाने शुरू हो गई है। डीएमके के कांग्रेस से दूरी बनाने के बाद अब डीएमके को एनडीए के नजदीक लाने की कवायद शुरू हो गई है। हालांकि डीएमके एनडीए से घोषित तौर पर अलग रहा है और इसके गठबंधन में आने की फिलहाल कोई संभावना नहीं है लेकिन जानकारों का कहना है कि भविष्य के संवैधानिक संशोधनों, खास कर नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू कराने के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत जुटाने की रणनीति पर काम हो रहा है। इसी क्रम में डीएमके के साथ मुद्दा आधारित समझ और टीएमसी में संभावित टूट की संभावनाओँ को टटोला जा रहा है।
अभिषेक सिंघल
नई दिल्ली। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम के बाद अब राष्ट्रीय राजनीति का परिदृश्य बदलने की कवायद भी अंदरखाने शुरू हो गई है। डीएमके के कांग्रेस से दूरी बनाने के बाद अब डीएमके को एनडीए के नजदीक लाने की कवायद शुरू हो गई है। हालांकि डीएमके एनडीए से घोषित तौर पर अलग रहा है और इसके गठबंधन में आने की फिलहाल कोई संभावना नहीं है लेकिन जानकारों का कहना है कि भविष्य के संवैधानिक संशोधनों, खास कर नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू कराने के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत जुटाने की रणनीति पर काम हो रहा है। इसी क्रम में डीएमके के साथ मुद्दा आधारित समझ और टीएमसी में संभावित टूट की संभावनाओँ को टटोला जा रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि किसी बड़े संवैधानिक विधेयक पर टीएमसी के भीतर अलग-अलग रुख सामने आ सकते हैं। उधर, आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा पहले ही भाजपा में आ चुके हैं।
संसद में मुद्दों के आधार पर समर्थन या अनुपस्थिति जैसी संभावनाओं की तलाश के लिए अभी से सम्पर्क के संकेत और कोशिश की जा सकती है। गौरतलब है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम संशोधन बिल के संसद से पारित नहीं होने के बाद से इसे किसी अन्य रूप में लागू करने की राह तलाशी जा रही है। लगातार इस पर काम करने की बात अलग अलग तरीके से कही जा चुकी है।
तमिलनाडु में कांग्रेस के टीवीके सरकार को समर्थन के बाद डीएमके कांग्रेस से दूरी बना ली थी। इसके बाद डीएमके ने लोकसभा में अपने सांसदों के लिए अलग बैठने की व्यवस्था मांग करते हुए पत्र लिखा। इसे दोनों दलों के रिश्तों में दरार के रूप में देखा गया। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले समय में डीएमके संसद के भीतर मुद्दा-आधारित स्टैंड के रास्ते को अपना सकती है। लोकसभा डीएमके के 22 सांसद हैं। वहीं राज्यसभा में भी डीएमके के 8 सदस्य हैं। ऐसे में वहां भी यह संख्या महत्वपूर्ण है। जानकार सूत्रों ने बताया कि ऐसे में एनडीए की ओर से डीएमके को मुद्दा आधारित स्टैंड लेने के लिए तैयार करने के प्रयास हो रहे हैं।
- लोकसभा में 22 व राज्यसभा में 8 सांसद
- कांग्रेस-टीवीके समीकरण के बाद बढ़ी दूरी
- संसद में अलग बैठने की मांग से बढ़ी दूरी
- दक्षिणी राज्यों को साधने वाला डिलिमिटेशन फार्मूला संभव
-मुद्दा आधारित समर्थन या अनुपस्थिति पर नजर
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद टीएमसी के भीतर अंसतोष के स्वर तेज हुए हैं। वहीं टीएमसी के कई लोग भाजपा में शामिल होने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि वहां की स्थानीय भाजपा इकाई ने नए सदस्य बनने पर रोक लगा दी है। वहीं टीएमसी की हार के बाद उभरे विरोध के स्वरों के बीच ममता बनर्जी खुद कह चुकी हैं कि जो जाना चाहते हैं, जा सकते हैं। चुनाव में हार के बाद कोलकाता में पिछले दिनों हुए पहले बड़े प्रदर्शन में टीएमसी के 80 से महज 36 विधायक ही पहुंचे। वहीं उत्तर चौबीस परगना जिले की कंचनपारा नगरपालिका में 24 में से 15 पार्षद और हालीशहर नगरपालिका में 23 में से 16 पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है। माना जा रहा है कि निचले स्तर पर उभर रहा यह असंतोष पार्टी के लोकसभा और राज्यसभा संसदीय दल में भी सामने आ सकता है। गौरतलब है कि टीएमसी के लोकसभा में 29 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं। हालांकि टूट के लिए टीएमसी के लोकसभा में 20 और राज्यसभा में 8 सांसदों का एक साथ आना जरूरी होगा।
पिछले दिनों लोकसभा में टीएमसी ने काकोली घोष दस्तीदार की जगह कल्याण बनर्जी को फिर से चीफ व्हिप नियुक्त किया है। जिस पर काकोली ने सोशल मीडिया पर लिखा, “चार दशक की निष्ठा का यही पुरस्कार मिला।” वहीं केंद्र सरकार ने उन्हें हाल ही में सीआईएसएफ की वाई श्रेणी सुरक्षा भी दी है। यह सुरक्षा केंद्रीय खुफिया एजेंसियों की थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर दी गई है।
टीएमसीः क्या संकेत
- चुनावी हार के बाद असंतोष की चर्चाएं
-कोलकाता प्रदर्शन में 80 में से सिर्फ 36 विधायक ही पहुंचे
-उत्तर 24 परगना जिले के कंचनपारा व हालीशहर में पार्षदों के इस्तीफे
-लोकसभा में 29 राज्यसभा में 13 सांसद
-बड़े विधेयकों पर अलग रुख की संभावनाओं पर नजर
-काकोली घोष प्रकरण से अंदरूनी खींचतान उजागर