25 मई 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सरकारों की देरी, गांव-शहरों पर भारी, पंचायत और नगर निकाय चुनाव टले तो अटक सकते हैं करोड़ों के फंड

गांवों की पंचायतों से लेकर नगर निगमों तक, देश में स्थानीय लोकतंत्र का बड़ा हिस्सा चुनावी देरी का शिकार है। नतीजा यह है कि राजस्थान समेत कई राज्यों में पंचायत और शहरी निकाय चुनाव समय पर नहीं होने से केंद्र सरकार ने वित्त आयोग की करोड़ों रुपए की ग्रांट रोक दी या सीमित कर दी। इसका असर गांवों की सड़क, पेयजल और सफाई योजनाओं से लेकर शहरों की सीवरेज, स्ट्रीट लाइट और कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी सेवाओं तक दिखाई देने लगा है। राजस्थान में पंचायत और शहरी निकाय चुनावों को लेकर हाल में हाईकोर्ट की सख्ती के बाद यह मुद्दा फिर राष्ट्रीय चर्चा में है

4 min read
Google source verification
Panchayat Chunav

नई दिल्ली। गांवों की पंचायतों से लेकर नगर निगमों तक, देश में स्थानीय लोकतंत्र का बड़ा हिस्सा चुनावी देरी का शिकार है। नतीजा यह है कि राजस्थान समेत कई राज्यों में पंचायत और शहरी निकाय चुनाव समय पर नहीं होने से केंद्र सरकार ने वित्त आयोग की करोड़ों रुपए की ग्रांट रोक दी या सीमित कर दी। इसका असर गांवों की सड़क, पेयजल और सफाई योजनाओं से लेकर शहरों की सीवरेज, स्ट्रीट लाइट और कचरा प्रबंधन जैसी बुनियादी सेवाओं तक दिखाई देने लगा है।

दरअसल, राजस्थान में पंचायत और शहरी निकाय चुनावों को लेकर हाल में हाईकोर्ट की सख्ती के बाद यह मुद्दा फिर राष्ट्रीय चर्चा में है। केंद्र सरकार पहले ही साफ कर चुकी है कि जहां निर्वाचित पंचायतें और नगर निकाय नहीं होंगे, वहां 15 वें वित्त आयोग की ग्रांट पूरी तरह जारी नहीं की जाएगी। केंद्र का तर्क है कि स्थानीय निकायों के चुनाव कराना राज्यों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। राजस्थान के साथ तमिल नाडु और कर्नाटक चुनाव में टालमटोल करने वाले बड़े राज्य है।

देरी से कराए चुनाव

महाराष्ट्र और तेलंगाना में पहले कई बार स्थानीय निकाय चुनाव टाले गए, लेकिन दोनों राज्यों में करीब दो साल की देरी पर चुनाव हुए। - केंद्र की दो टूक: निर्वाचित निकाय नहीं तो पूरा फंड नहीं सूत्रों के मुताबिक पंचायती राज मंत्रालय और आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय राज्यों को एडवाइजरी भेज चुके हैं कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों में देरी वित्तीय नुकसान का कारण बनेगी। नियम यह है कि केवल उन्हीं स्थानीय निकायों को पूरी ग्रांट मिलेगी जहां निर्वाचित प्रतिनिधि मौजूद हों। यानी यदि पंचायत, नगर परिषद या नगर निगम प्रशासकों के भरोसे चल रहे हैं तो वहां केंद्र की वित्त आयोग सहायता प्रभावित हो सकती है। - राजस्थान में ग्रामीण ग्रांट पहले ही प्रभावित राज्यसभा में केंद्र सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार पंचायत चुनाव में देरी के चलते राजस्थान की ग्रामीण स्थानीय निकाय ग्रांट प्रभावित हुई। 2025-26 में राजस्थान की करीब 785.90 करोड़ रुपए की राशि लंबित रही। तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों पर भी इसका असर पड़ा।

वर्षवार ग्रामीण फंड रोका गया (राशि करोड़ रुपए में)

राज्य 2023-24 2024-25 2025-26
राजस्थान 0 0 785.90
तमिलनाडु 0 0 1572.25
महाराष्ट्र 880.79 1606.28 754.05
कर्नाटक 373.50 395.55 0
आंध्र प्रदेश 33.55 42.03 31.63

शहरों पर भी असर, राजस्थान को आधा मिला फंड

शहरी निकायों के मामले में भी तस्वीर बहुत बेहतर नहीं है। 2024-25 में राजस्थान को 15वें वित्त आयोग के तहत अर्बन लोकल बॉडीज के लिए 1349 करोड़ रुपए की सिफारिश थी, लेकिन केंद्र से केवल 630.41 करोड़ रुपए जारी हुए। सबसे अहम बात यह रही कि छोटे और मध्यम शहरों के लिए प्रस्तावित बेसिक और टाइड ग्रांट जारी ही नहीं हुई। केवल जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसे मिलियन प्लस शहरों से जुड़ी कुछ ग्रांट रिलीज हुई।

कैग जता चुका है चिंता

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने 74वें संविधान संशोधन के क्रियान्वयन पर 18 राज्यों की ऑडिट रिपोर्ट में 2014 से 2021 के बीच शहरी निकायों की स्थिति का आकलन किया था। ऑडिट के दौरान 2,625 शहरी निकायों में से 1,600 में निर्वाचित परिषद नहीं थी। मध्य प्रदेश में 407 में से 347 निकाय बिना निर्वाचित परिषद के मिले, जबकि राजस्थान में 196 में से 6 निकायों में निर्वाचित परिषद नहीं थी। हालांकि मध्य प्रदेश में 2014 के बाद 2022 में नगर निकाय चुनाव कराने के बाद स्थिति बदल गई।

तेलंगाना: चुनाव नहीं होने पर 550 करोड़ लैप्स

तेलंगाना में केंद्र की ग्रांट प्रभावित होने का मामला मुख्य रूप से 2024-25 और 2025-26 वित्त वर्ष से जुड़ा था। स्थानीय निकाय चुनाव मार्च 2026 तक नहीं होने पर करीब 550 करोड़ रुपए की राशि लैप्स हो गई। नवंबर 2025 में तेलंगाना कैबिनेट ने माना था कि चुनाव नहीं होने पर करीब 3,000 करोड़ रुपए की 15वें वित्त आयोग की ग्रांट प्रभावित हो सकती है।

बेंगलुरु: चुनाव में देरी से 2304 करोड़ का असर

बेंगलुरु नगर निगम चुनाव में करीब पांच साल की देरी के कारण बीबीएमपी को लगभग 2,304 करोड़ रुपए की वित्त आयोग ग्रांट नहीं मिल सकी। वहीं स्थानीय निकाय चुनाव लंबित रहने से कर्नाटक को हर साल करीब 6,000 करोड़ रुपए तक की केंद्रीय ग्रांट प्रभावित होने की आशंका जताई गई।

महाराष्ट्र: प्रशासकों के भरोसे शहर

मुंबई, पुणे और नागपुर समेत कई नगर निकाय लंबे समय तक प्रशासकों के जरिए चलते रहे। नागपुर नगर निगम ने 16वें वित्त आयोग के सामने कहा कि चुनाव में देरी के कारण 2023-26 के दौरान ग्रांट प्रभावित हुई।

पंचायत निकायों के प्रमुख कार्य

-पेयजल

-पंचायत भवन

-नाली-सड़क ठोस

-अपशिष्ट प्रबंधन मनरेगा समन्वय ...

नगरीय निकायों के प्रमुख कार्य

-सफाई व्यवस्था

-सीवरेज

-स्ट्रीट लाइट

- पार्क

-प्रॉपर्टी टैक्स प्रबंधन

-शहरी परिवहन

संविधान क्या कहता है

73वें और 74वें संविधान संशोधन के तहत पंचायतों और नगर निकायों का कार्यकाल पांच साल तय है। कार्यकाल समाप्त होने से पहले या अधिकतम छह महीने के भीतर चुनाव कराना राज्यों और राज्य निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी मानी गई है। सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में साफ कर चुका है कि परिसीमन या आरक्षण प्रक्रिया चुनाव अनिश्चितकाल तक टालने का आधार नहीं बन सकती।

नियमित चुनाव नहीं हुए तो अटक जाएंगे शहरों के 3.56 लाख करोड़

16 वें वित्त आयोग को 1 अप्रेल से लागू किया जा चुका है। आयोग स्थानीय निकायों की जवाबदेही और वित्तीय सुधारों पर जोर दे रही हैं। पीआरएस की रिपोर्ट के अनुसार 2026-31 के लिए अर्बन लोकल बॉडीज को 3.56 लाख करोड़ रुपए की ग्रांट प्रस्तावित है, लेकिन इसके लिए नियमित चुनाव, वित्तीय पारदर्शिता और स्थानीय कर सुधार जैसी शर्तें अहम होंगी। यानी आने वाले समय में निकाय चुनाव सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं रहेंगे, बल्कि राज्यों की वित्तीय सेहत और विकास योजनाओं से भी सीधे जुड़े रहेंगे।

बड़ी खबरें

View All

नई दिल्ली

दिल्ली न्यूज़

ट्रेंडिंग