प्रारंभिक परीक्षण में डिवाइस के जरिए आठ स्वस्थ लोगों और पांच कैंसर पीडि़तों के बीच के अंतर का सटीक पता लगाया गया।
नई दिल्ली. फेफड़ों का कैंसर दुनिया में कैंसर से होनी वाली मौतों में सबसे बड़ी वजह है और अक्सर एडवांस स्टेज में इसका पता चलता है, जब इसके उपचार के विकल्प सीमित होते हैं। अब चीन के झेजियांग विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ऐसा डिवाइस तैयार किया है, जो सांसों से फेफड़ों के कैंसर का पता लगा सकता है। प्रारंभिक परीक्षण में डिवाइस के जरिए आठ स्वस्थ लोगों और पांच कैंसर पीडि़तों के बीच के अंतर का सटीक पता लगाया गया। यह अल्ट्रा सेंसिटिव मॉनिटर वाले प्रोटोटाइप डिवाइस आइसोप्रीम नामक यौगिक को ढूंढ़ता है। वैज्ञानिकों का कहना है आइसोप्रीन के निम्न स्तर को फेफड़े के कैंसर के संभावित संकेतक के रूप में देखा जाता है। हालांकि यह परिवर्तन छोटा होता है, जिसे मापना काफी मुश्किल है। साइंस अलर्ट में प्रकाशित शोध रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने लिखा, हमारा कार्य न केवल श्वास विश्लेषण के जरिए कम लागत वाली कम तकलीफदेह कैंसर जांच उपलब्ध करवाना है, बल्कि अत्याधुनिक गैस सेंसिंग सामग्रियों के तर्कसंगत डिजाइन को आगे बढ़ा भी है।
ऐसे की जांच
शोधकर्ताओं ने श्वास मॉनिटर में आवश्यक संवेदनशीलता लाने के लिए प्लेटिनम, इंडियम, निकल और ऑक्सीजन के सयोजन से बने नैनोफ्लेक्स का उपयोग किया। जब आइसोप्रीन नैनोफ्लेक्स से टकराता है तो इससे होने वाले इलेक्ट्रॉन उत्सर्जन को मापा जा सकता है।
आइसोप्रीन के स्तर से पता चलती है बीमारी
शोधकर्ताओं का कहना है कि फेफड़ों के कैंसर से होने वाली क्षति शरीर की कुछ प्रमुख मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है। यह परिवर्तन किसी न किसी तरह से आइसोप्रीन का स्तर प्रभावित करता है, जिसे मापकर बीमारी का पता लगाया जा सकता है।