जब इरादे बुलंद हों और अपनी संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम हो, तो सात समंदर की दूरी भी फीकी पड़ जाती है। यूरोप के ठंडे मिजाज वाले देश नीदरलैंड्स में उस वक्त मरुधरा की महक घुल गई, जब हेग शहर में राजस्थानी परिधानों में सजे प्रवासी भारतीयों ने गणगौर उत्सव का शंखनाद किया। कुछ ऐसा […]
जब इरादे बुलंद हों और अपनी संस्कृति के प्रति अटूट प्रेम हो, तो सात समंदर की दूरी भी फीकी पड़ जाती है। यूरोप के ठंडे मिजाज वाले देश नीदरलैंड्स में उस वक्त मरुधरा की महक घुल गई, जब हेग शहर में राजस्थानी परिधानों में सजे प्रवासी भारतीयों ने गणगौर उत्सव का शंखनाद किया। कुछ ऐसा ही भावुक और गर्व से भर देने वाला दृश्य नीदरलैंड के हेग शहर में देखने को मिला, जहां 120 माहेश्वरी परिवारों ने मिलकर पारंपरिक उल्लास के साथ गणगौर उत्सव मनाया और विदेशी धरती पर राजस्थानी संस्कृति की अनुपम छटा बिखेर दी। विदेशी धरती पर आयोजित यह गणगौर उत्सव केवल एक त्योहार नहीं था, बल्कि यह उस सांस्कृतिक सेतु का प्रतीक बन गया, जो हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए भी भारतीयों को अपनी मिट्टी, अपनी परंपराओं और अपने समाज से मजबूती से जोडक़र रखता है। नीदरलैंड में रहने वाले राम और नितिशा माहेश्वरी (पंसारी) के अनुसार, यहां बसे पूरे माहेश्वरी समाज ने एकजुट होकर इस आयोजन को केवल त्योहार नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जुड़े रहने का उत्सव बना दिया।
प्रबंधन की कुशल डोर
इस बिखरे हुए मोतियों जैसे समुदाय को एक सूत्र में पिरोने का जिम्मा संजय-निधि चांडक, हरीश-श्रीकांता मूंदड़ा, सुमित-मेघा माहेश्वरी और आनंद-कोमल लाहोटी ने उठाया है। इनके साथ सुनील लोया, सुमित मूंदड़ा और सुनील बालदी जैसे साथियों की टोली महेश नवमी से लेकर दीपावली तक हर पर्व को उसी भव्यता से जीवंत कर रही है, जिसकी गूंज भारत के गलियारों में सुनाई देती है।
उत्सव की वो खास बातें, जिन्होंने मोह लिया मन
यूरोप में मिल गया अपना घर
ग्वालियर निवासी गोविंद पंसारी (राम के पिता) ने गर्व के साथ कहा, बच्चों के इन प्रयासों ने यूरोप में रह रहे हर माहेश्वरी परिवार को एक अपना घर दे दिया है। यह संस्कार प्रवाह ही हमारी समाज की असली पूंजी है।