
Childhood trauma anhedonia: कभी ऐसा होता है कि जिंदगी में सब कुछ ठीक चल रहा होता है, लेकिन भीतर से खुशी महसूस नहीं होती। पसंदीदा काम में पहले जैसा उत्साह नहीं रहता, उपलब्धियां हासिल करने पर भी मन में संतुष्टि नहीं आती, और उन चीज़ों में भी दिलचस्पी कम हो जाती है जो कभी बेहद अच्छी लगती थीं। मनोविज्ञान में इस स्थिति को एन्हेडोनिया कहा जाता है। यानी खुशी या आनंद महसूस करने की क्षमता में कमी आ जाना।
2026 की एक नई मस्तिष्क-विज्ञान रिसर्च ने संकेत दिया है कि इस समस्या की जड़ केवल वर्तमान तनाव या अवसाद में नहीं, बल्कि बचपन में झेले गए आघात और उससे जुड़े दिमाग के इनाम-तंत्र (रिवॉर्ड सर्किट) में भी हो सकती है।
टेंपल यूनिवर्सिटी की कैथलीन ओ'ब्रायन और ऑरेगन यूनिवर्सिटी के विष्णु मूर्ति के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि बचपन के आघात और बाद की जिंदगी में खुशी महसूस करने की क्षमता के बीच संबंध किस तरह बनता है।
यह अध्ययन एक बड़े समूह पर किया गया, जिसमें प्रतिभागियों से बचपन के आघात और आनंद अनुभव करने की क्षमता से जुड़े सवाल पूछे गए। इसके बाद मस्तिष्क-स्कैनिंग (FMRI) के जरिए यह देखा गया कि दिमाग के अलग-अलग हिस्से, खासकर हिप्पोकैम्पस और प्रेरणा से जुड़ा क्षेत्र, किस तरह एक-दूसरे के साथ काम कर रहे हैं।
नतीजा खास तौर पर हिप्पोकैम्पस से जुड़े मार्गों पर केंद्रित था। जिन प्रतिभागियों में बचपन के आघात का इतिहास था और साथ ही हिप्पोकैम्पस तथा प्रेरणा/इनाम से जुड़े मस्तिष्क मार्गों की कार्यक्षमता कमजोर थी, उनमें एन्हेडोनिया उन प्रतिभागियों की तुलना में ज्यादा पाई गई, जिनमें आघात का इतिहास तो था, लेकिन इन मार्गों में कोई खास गड़बड़ी नहीं थी।
जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस में प्रकाशित अध्ययन के सह-लेखक विष्णु मूर्ति के मुताबिक, यह उन शुरुआती अध्ययनों में से एक है जो हिप्पोकैम्पस, जिसे आमतौर पर सिर्फ याददाश्त से जोड़ा जाता है, को इंसानों में उदासीन व्यवहार से सीधे जोड़ता है। इससे पहले जानवरों पर हुई शुरुआती रिसर्च में भी संकेत मिले थे कि हिप्पोकैम्पस में बदलाव एन्हेडोनिया में भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन इंसानों में इस कड़ी को इतनी स्पष्टता से दिखाने वाला यह अपनी तरह का शुरुआती काम है।
हिप्पोकैम्पस को आम तौर पर हमारी याददाश्त और अनुभवों को संदर्भ देने वाला मस्तिष्क क्षेत्र माना जाता है। लेकिन नई रिसर्च यह संकेत देती है कि इसका संबंध इनाम और प्रेरणा से जुड़े तंत्रिका-मार्गों (न्यूरल सर्किट) के साथ भी महत्वपूर्ण हो सकता है। यानी हिप्पोकैम्पस सिर्फ यह याद नहीं रखता कि क्या हुआ, बल्कि यह तय करने में भी भूमिका निभा सकता है कि आगे किस चीज से संतुष्टि मिलने की उम्मीद की जाए।
बचपन में लंबे समय तक डर, उपेक्षा, हिंसा, असुरक्षा या अन्य प्रतिकूल अनुभव रहने पर दिमाग लगातार तनाव की स्थिति में रह सकता है। समय के साथ इनाम सीखने और उसकी उम्मीद करने वाली प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं।
पहले के अध्ययनों में भी बचपन के आघात को इनाम-प्रक्रिया में बदलाव और एन्हेडोनिया से जोड़ा गया है। शोध से यह संकेत मिला है कि प्रतिकूल बचपन के अनुभवों के बाद व्यक्ति इनाम से जुड़ी जानकारी को सीखने या उसका मूल्यांकन करने में कम संवेदनशील हो सकता है। यानी समस्या केवल यह नहीं कि व्यक्ति खुशी महसूस नहीं कर रहा, बल्कि दिमाग का वह सिस्टम भी बदल सकता है, जो पहले से तय करता है कि 'यह चीज मेरे लिए महत्वपूर्ण या सुखद है।'
बचपन का लगातार बना रहने वाला तनाव शरीर के तनाव-प्रतिक्रिया तंत्र को लंबे समय तक सक्रिय रख सकता है। वैज्ञानिक साहित्य में शुरुआती जीवन के तनाव को इनाम-संवेदनशीलता, प्रेरणा और इनाम-अधिगम में बदलाव से जोड़ा गया है।
कुछ शोधों में डोपामीन से जुड़े इनाम-मार्गों, तनाव-हार्मोन, सूजन (इन्फ्लेमेशन) और दूसरे जैविक तंत्रों की भूमिका पर भी चर्चा हुई है। हालांकि इन सभी तंत्रों को किसी एक व्यक्ति में एन्हेडोनिया का निश्चित कारण मानना अभी जल्दबाजी होगी। यही कारण है कि दो लोग समान प्रकार का बचपन का आघात झेलने के बावजूद भविष्य में बिल्कुल अलग मानसिक स्वास्थ्य परिणाम अनुभव कर सकते हैं।
बचपन के प्रतिकूल अनुभवों (ACE) पर पहले हुई बड़ी आबादी-आधारित रिसर्च में भी यह देखा गया है कि ऐसे अनुभवों की संख्या और भविष्य में मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य जोखिमों के बीच एक सीधा संबंध होता है। यानी जितने ज्यादा प्रतिकूल अनुभव, जोखिम की संभावना उतनी ज्यादा। लेकिन यह कोई तय नियम नहीं, बल्कि एक सांख्यिकीय प्रवृत्ति है।
एन्हेडोनिया केवल मूड खराब होना नहीं है। इसमें व्यक्ति को खुशी, रुचि या प्रेरणा में स्पष्ट कमी महसूस हो सकती है। पसंदीदा गतिविधियां भी फीकी लग सकती हैं। यह अवसाद, अभिघातज तनाव विकार (PTSD) और कुछ अन्य मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों में दिखाई दे सकती है। शोध में एन्हेडोनिया को अधिक गंभीर अवसाद के लक्षणों और खराब चिकित्सकीय परिणामों से भी जोड़ा गया है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति में लंबे समय तक उत्साह, रुचि और आनंद की कमी बनी रहती है, तो इसे केवल आलस या व्यक्तित्व की कमजोरी समझना सही नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एन्हेडोनिया का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति हमेशा के लिए खुशी खो चुका है। इलाज कारण के अनुसार किया जाता है। यदि इसके पीछे अवसाद, पीटीएसडी या कोई अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, तो उसका उपचार महत्वपूर्ण होता है। मनोचिकित्सा, खासकर आघात-केंद्रित तरीके, संज्ञानात्मक-व्यवहार तकनीकें और व्यवहार आधारित हस्तक्षेप, कुछ लोगों में उपयोगी हो सकते हैं।
डॉक्टर जरूरत के मुताबिक अवसादरोधी (Anti dipression) या अन्य मनोरोग दवाएं (Psychiatric medications) भी इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन किसी दवा को केवल एन्हेडोनिया के आधार पर स्वयं शुरू या बंद नहीं करना चाहिए। कुछ मामलों में 'व्यवहार सक्रियण' (Behavioral Activation) जैसी रणनीतियां व्यक्ति को धीरे-धीरे उन गतिविधियों में वापस शामिल करने में मदद करती हैं, जिनसे पहले संतुष्टि मिलती थी। नियमित नींद, शारीरिक गतिविधि, सामाजिक जुड़ाव और संरचित दिनचर्या भी उपचार का हिस्सा बन सकते हैं।
भविष्य में मस्तिष्क-उद्दीपन (Brain Stimulation) और इनाम-तंत्र (Reward System) को लक्षित करने वाली चिकित्सा पद्धतियों पर भी शोध जारी है। हालांकि नए हिप्पोकैम्पस-संबंधी निष्कर्षों को अभी उपचार में सीधे इस्तेमाल करने के लिए और चिकित्सकीय रिसर्च की आवश्यकता है। शोध टीम का अगला लक्ष्य हिप्पोकैम्पस के भीतर ऐसे विशिष्ट मार्गों को पहचानना है, जिन्हें लक्षित करके बचपन के आघात से जुड़ी एन्हेडोनिया को कम किया जा सके।
इस अध्ययन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह हिप्पोकैम्पस को केवल स्मृति-केंद्र के रूप में देखने के बजाय याददाश्त, प्रेरणा और इनाम के बीच संभावित पुल के रूप में सामने लाता है।
अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि बचपन का आघात किसी व्यक्ति का भविष्य तय कर देता है। लेकिन नई रिसर्च यह जरूर बताती है कि बचपन के अनुभव दिमाग के इनाम और प्रेरणा तंत्र पर लंबे समय तक असर डाल सकते हैं। और शायद यही इस खोज का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। खुशी महसूस करने की क्षमता केवल व्यक्तित्व की बात नहीं, बल्कि दिमाग की एक जटिल जैविक प्रक्रिया भी है।