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तेलंगाना का नया सोलर मिशन: 2030 तक 20,000 MW बिजली- इतनी जमीन और पानी कहां से आएगा?

Telangana 20000 MW Solar Plan : तेलंगाना ने 2030 तक 20,000 MW सौर ऊर्जा का लक्ष्य रखा है। जानिए इतने बड़े सोलर मिशन के लिए 1 लाख एकड़ जमीन, पानी की खपत और बिजली ग्रिड व बैटरी स्टोरेज से जुड़ी असली चुनौतियां क्या हैं।
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Telangana 20000 MW Solar Plan

Telangana 20000 MW Solar Plan : क्या पूरा हो पाएगा तेलंगाना का 20,000MW का प्लान, PC- Chatgpt

तेलंगाना ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ा लक्ष्य तय किया है। राज्य सरकार की योजना 2030 तक 20,000 MW और 2035 तक 26,000 MW सौर ऊर्जा क्षमता तक पहुंचने की है। यह लक्ष्य सिर्फ नए सोलर पैनल लगाने का नहीं है, बल्कि इसके साथ जमीन, ट्रांसमिशन नेटवर्क, भंडारण और पानी जैसे कई सवाल जुड़े हैं।

क्योंकि सोलर बिजली में एक दिलचस्प विरोधाभास है। बिजली बनाने के लिए ईंधन की जरूरत नहीं होती, लेकिन बड़े सोलर पार्कों के लिए जमीन चाहिए और पैनलों की सफाई व कुछ सहायक प्रणालियों में पानी की जरूरत पड़ सकती है।

तो सवाल है 20,000 MW का लक्ष्य हासिल करने के लिए तेलंगाना को कितना बड़ा सोलर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना होगा?

पहले समझिए, 20,000 MW का लक्ष्य कितना बड़ा है?

तेलंगाना में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। राज्य ने अब इसे अगले स्तर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। सरल भाषा में समझें:

लक्ष्यसौर क्षमता
203020,000 MW
203526,000 MW
2030 के बाद अतिरिक्त क्षमता6,000 MW

यानी 2030 से 2035 के बीच भी करीब 6,000 MW नई सौर क्षमता जोड़ने का लक्ष्य है। लेकिन यहां एक जरूरी बात है MW क्षमता और वास्तविक बिजली उत्पादन एक ही चीज नहीं हैं।

सोलर प्लांट दिन-रात लगातार पूरी क्षमता से बिजली नहीं बनाते। धूप की उपलब्धता, मौसम, बादल और दिन की अवधि के कारण वास्तविक उत्पादन स्थापित क्षमता से कम होता है। इसीलिए 20,000 MW सौर क्षमता का मतलब यह नहीं कि तेलंगाना को हर समय 20,000 MW बिजली मिलेगी।

20,000 MW के लिए कितनी जमीन चाहिए?

यही इस मिशन का सबसे बड़ा सवाल है। एक बड़े ग्राउंड-माउंटेड सोलर प्लांट के लिए जमीन की जरूरत तकनीक, पैनल की दक्षता, साइट की भौगोलिक स्थिति और परियोजना के डिजाइन पर निर्भर करती है।

आम तौर पर 1 MW सौर परियोजना के लिए करीब 4-5 एकड़ जमीन का मोटा अनुमान इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि आधुनिक उच्च दक्षता वाले पैनल और बेहतर डिजाइन में यह आवश्यकता कम भी हो सकती है।

अगर हम केवल एक मोटा अनुमान लगाएं:

20,000 MW × 4-5 एकड़ = 80,000 से 1,00,000 एकड़ जमीन। यानी 2030 के लक्ष्य के लिए बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत पड़ सकती है।

सौर क्षमताजमीन की अनुमानित जरूरत
1 MW4-5 एकड़
1,000 MW4,000-5,000 एकड़
10,000 MW40,000-50,000 एकड़
20,000 MW80,000-1,00,000 एकड़

ध्यान दें: यह केवल अनुमानित गणना है। वास्तविक जमीन की जरूरत परियोजना-दर-परियोजना अलग होगी।

क्या इतनी जमीन एक ही जगह चाहिए?

नहीं। 20,000 MW का मतलब यह नहीं कि तेलंगाना में एक ही जगह पर कोई विशाल सोलर पार्क बनाया जाएगा। यह क्षमता कई तरीकों से विकसित हो सकती है:

  • बड़े सोलर पार्क
  • अलग-अलग जिलों में ग्राउंड-माउंटेड परियोजनाएं
  • सरकारी/बंजर भूमि पर परियोजनाएं
  • निजी जमीन पर सोलर प्लांट
  • रूफटॉप सोलर
  • फ्लोटिंग सोलर
  • कृषि क्षेत्र में उपयुक्त मॉडल के साथ सौर परियोजनाएं

यानी वास्तविक जमीन की जरूरत इस बात पर भी निर्भर करेगी कि 20,000 MW में से कितनी क्षमता बड़े जमीन आधारित प्लांटों से आएगी और कितनी रूफटॉप या दूसरे मॉडल से।

असली सवाल: क्या सोलर पार्क खेती की जमीन पर बनेंगे?

यह मुद्दा तेलंगाना जैसे कृषि प्रधान राज्य में महत्वपूर्ण है। अगर बड़े सोलर पार्कों के लिए उपजाऊ कृषि भूमि का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है तो इससे किसानों की जमीन, स्थानीय रोजगार और खाद्य उत्पादन पर सवाल उठ सकते हैं। इसलिए सौर विस्तार के लिए बेहतर रणनीति हो सकती है: बंजर/कम उपयोग वाली जमीन + रूफटॉप + पहले से उपलब्ध औद्योगिक क्षेत्र + उपयुक्त सरकारी भूमि। लेकिन इसका अंतिम असर परियोजना के स्थान और भूमि नीति पर निर्भर करेगा।

क्या सोलर बिजली बनाने में बहुत पानी लगता है?

यहां सोलर और थर्मल पावर के बीच बड़ा अंतर है। सोलर फोटोवोल्टिक (PV) पैनल बिजली बनाने के लिए पानी नहीं जलाते। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में बॉयलर और कूलिंग सिस्टम के कारण बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। सोलर PV में ऐसी प्रक्रिया नहीं होती। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सोलर प्लांट में पानी की जरूरत बिल्कुल शून्य है। सबसे बड़ा इस्तेमाल हो सकता है-

पैनलों की सफाई : धूल और मिट्टी पैनल पर जमा होने से उनकी बिजली उत्पादन क्षमता कम हो सकती है। इसलिए समय-समय पर पैनलों की सफाई करनी पड़ती है। तेलंगाना में यह सवाल और महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य के कई हिस्सों में गर्मी और धूल दोनों काफी ज्यादा हैं।

पानी की जरूरत कितनी हो सकती है? : यहां एक निश्चित संख्या बताना मुश्किल है क्योंकि पानी की खपत इस बात पर निर्भर करती है कि प्लांट में सफाई कैसे होती है। उदाहरण के लिए:

  • पारंपरिक पानी आधारित सफाई
  • ड्राई क्लीनिंग
  • रोबोटिक सफाई
  • कम पानी वाली तकनीक

इनमें पानी की जरूरत अलग-अलग होगी। यानी 20,000 MW के लिए पानी की खपत का एक ही आंकड़ा देना गलत होगा।

लेकिन बड़ी तस्वीर साफ है। अगर हजारों MW के ग्राउंड-माउंटेड सोलर प्लांट में पारंपरिक पानी आधारित सफाई अपनाई जाती है, तो गर्म और सूखे इलाकों में स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए तेलंगाना के लिए सोलर विस्तार के साथ कम पानी वाली पैनल-सफाई तकनीक महत्वपूर्ण होगी।

क्या सोलर प्लांट पानी के लिए खेती से मुकाबला करेंगे?

कुछ क्षेत्रों में यह संभव है। तेलंगाना में पहले से ही भूजल और सिंचाई का दबाव कई इलाकों में चिंता का विषय रहा है। अगर किसी सोलर पार्क को ऐसे क्षेत्र में लगाया जाता है जहां पानी की उपलब्धता सीमित है और पैनलों की सफाई के लिए लगातार भूजल निकाला जाता है, तो समस्या पैदा हो सकती है। इसलिए सौर परियोजनाओं में एक जरूरी सवाल होना चाहिए: 'बिजली कितनी बनेगी?” के साथ “पानी कहां से आएगा?'

तीसरी चुनौती-बिजली ग्रिड इसे संभाल पाएगा?

यह शायद जमीन और पानी से भी बड़ी चुनौती है। सौर ऊर्जा की सबसे बड़ी समस्या है कि यह 24 घंटे उपलब्ध नहीं रहती। दोपहर में सौर उत्पादन बहुत ज्यादा हो सकता है, लेकिन रात में उत्पादन शून्य हो जाता है। इसका मतलब है कि अगर तेलंगाना में 20,000 MW सौर क्षमता हो भी जाए तो राज्य को रात और कम धूप वाले समय में दूसरे स्रोतों की जरूरत बनी रहेगी। इसके लिए तीन चीजें महत्वपूर्ण होंगी:

  • मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण
  • अन्य बिजली स्रोतों के साथ संतुलन
  • सिर्फ पैनल लगाने से काम नहीं चलेगा

मान लीजिए किसी इलाके में हजारों MW का सोलर पार्क बना दिया गया। अगर वहां से बिजली निकालने के लिए पर्याप्त ट्रांसमिशन लाइन नहीं है तो उत्पादन का पूरा लाभ नहीं मिलेगा।

इसे ऐसे समझिए:

  • सोलर पार्क = बिजली का उत्पादन
  • ट्रांसमिशन लाइन = बिजली को बाहर निकालने का रास्ता

अगर उत्पादन तेजी से बढ़ा लेकिन ट्रांसमिशन नेटवर्क उसी गति से नहीं बढ़ा, तो ग्रिड में बाधाएं आ सकती हैं।

बैटरी क्यों जरूरी होगी?

सोलर बिजली का उत्पादन दिन में ज्यादा होता है जबकि बिजली की मांग शाम और रात में भी बनी रहती है। इस अंतर को कम करने के लिए Battery Energy Storage Systems (BESS) महत्वपूर्ण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए समझें।

दोपहर: सोलर उत्पादन ज्यादा → अतिरिक्त बिजली बैटरी में
शाम: सोलर उत्पादन घटा → बैटरी से बिजली

इससे सौर ऊर्जा को अधिक भरोसेमंद बनाया जा सकता है। लेकिन बैटरी की अपनी चुनौती हैं-लागत, आयातित खनिजों पर निर्भरता, तापमान प्रबंधन और इस्तेमाल के बाद बैटरी का निपटान।

2035 तक 26,000 MW क्यों?

2030 का लक्ष्य हासिल करने के बाद भी तेलंगाना रुकना नहीं चाहता। 2035 तक लक्ष्य को 26,000 MW करने का मतलब है कि अगले दशक में राज्य अपने बिजली तंत्र में सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी को काफी बढ़ाना चाहता है।

इसके पीछे कई कारण हैं:

  • बिजली की बढ़ती मांग
  • उद्योगों का विस्तार
  • डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर
  • इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती संख्या
  • जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना
  • उत्सर्जन कम करना

लेकिन इसके साथ राज्य को यह भी तय करना होगा कि सौर क्षमता बढ़ाने और जमीन-पानी की उपलब्धता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

तेलंगाना के लिए असली चुनौती क्या है?

20,000 MW का लक्ष्य सुनने में सबसे बड़ी चुनौती पैनल लगाना लगता है। लेकिन वास्तव में चार मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा।

  • जमीन : बड़े सोलर पार्कों के लिए बड़े भू-भाग की जरूरत होगी।
  • पानी : पैनलों की सफाई और परियोजना की अन्य गतिविधियों में पानी की जरूरत को कम करना होगा।
  • ग्रिड : उत्पादन बढ़ने के साथ ट्रांसमिशन और वितरण नेटवर्क को भी मजबूत करना होगा।
  • भंडारण : रात और बादल वाले समय के लिए बैटरी और अन्य ऊर्जा भंडारण जरूरी होगा।

तो क्या 20,000 MW का लक्ष्य मुश्किल है?

तकनीकी रूप से लक्ष्य हासिल किया जा सकता है, लेकिन असली चुनौती उसकी गुणवत्ता होगी। अगर राज्य सिर्फ MW जोड़ता गया और जमीन, पानी, ग्रिड और भंडारण की योजना पीछे रह गई तो बड़ी स्थापित क्षमता होने के बावजूद बिजली व्यवस्था को अपेक्षित फायदा नहीं मिलेगा। इसके उलट अगर तेलंगाना-

  • कम पानी वाली सौर तकनीक अपनाता है,
  • उपजाऊ कृषि भूमि पर दबाव कम रखता है,
  • रूफटॉप और विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा बढ़ाता है,
  • ट्रांसमिशन नेटवर्क पहले से तैयार करता है,
  • और बैटरी भंडारण को साथ-साथ बढ़ाता है,

तो 20,000 MW का लक्ष्य राज्य की ऊर्जा व्यवस्था को बदल सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है : तेलंगाना के लिए आने वाले वर्षों में चुनौती सिर्फ यह नहीं होगी कि 'कितने सोलर पैनल लगाए?' बल्कि सवाल होगा '20,000 MW सौर ऊर्जा के लिए कितनी जमीन गई, कितना पानी इस्तेमाल हुआ और उस बिजली को ग्रिड तक पहुंचाने में कितना नया इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पड़ा?'

क्योंकि सौर ऊर्जा को अक्सर “स्वच्छ और पानी बचाने वाली बिजली” कहा जाता है, लेकिन बड़े पैमाने पर इसका विस्तार भी संसाधनों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। तेलंगाना का 2030 का लक्ष्य इसी संतुलन की बड़ी परीक्षा बनने वाला है।