
North East Crop Branding Mission : क्या नार्थ ईस्ट की फसलों को मिलेगी पहचान, PC- Chatgpt
पूर्वोत्तर की चार खास उपज मेघालय की लाकाडोंग हल्दी, असम का मूगा सिल्क, त्रिपुरा का क्वीन पाइनएप्पल और अरुणाचल कीवी- को अब सिर्फ स्थानीय उत्पाद नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बनाने की कोशिश हो रही है। 2026 में चारों के लिए अलग-अलग मिशन शुरू किए गए हैं। सवाल यह है कि इन उत्पादों की कीमत बढ़ने का फायदा खेत और करघे तक कितना पहुंचेगा?
| उत्पाद | राज्य | 2026 की पहल | मुख्य फोकस |
|---|---|---|---|
| लाकाडोंग हल्दी | मेघालय | ₹175.45 करोड़ Golden Spice Mission | प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, निर्यात |
| मूगा सिल्क | असम | Senehjori Mission | रीलिंग, बुनाई, GI, निर्यात |
| क्वीन पाइनएप्पल | त्रिपुरा | ₹236 करोड़ Mission | प्रसंस्करण, कोल्ड-चेन, निर्यात |
| कीवी | अरुणाचल | करीब ₹167 करोड़ Mission | कोल्ड-चेन, मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग |
लाकाडोंग हल्दी: मेघालय में एक किसान समूह के उदाहरण में कच्ची हल्दी की तुलना में स्लाइस और पाउडर बेचने पर ज्यादा कीमत मिली। 2026 की एक सरकारी-संबंधित रिपोर्ट में समूह ₹250/kg पर स्लाइस और ₹300/kg पर पाउडर बेच रहा था। वहीं एक अन्य परियोजना के अनुसार किसानों की सालाना आय हाल के वर्षों में करीब ₹50-60 हजार रही।
मूगा सिल्क: सरकार के मुताबिक करीब 2.6 लाख rearer और weaver परिवार इससे जुड़े हैं, लेकिन क्षेत्र अभी काफी कम मूल्य प्राप्त करता है। मिशन का लक्ष्य उत्पादन से लेकर रीलिंग, बुनाई और निर्यात तक पूरी श्रृंखला को मजबूत करना है।
क्वीन पाइनएप्पल: यहां समस्या सबसे साफ दिखती है। 2026 में राज्य सरकार ने बताया कि छोटे किसानों को अभी करीब ₹6-10/kg फार्म-गेट कीमत मिलती है, जबकि प्रसंस्कृत या निर्यात-ग्रेड उत्पाद का संभावित मूल्य ₹80-150/kg तक बताया गया।
अरुणाचल कीवी: सरकार के अनुसार राज्य भारत के कुल कीवी उत्पादन का 50% से ज्यादा देता है और सालाना उत्पादन 7,050 टन से अधिक है। इसके बावजूद Grade-C कीवी के लिए किसान को करीब ₹20-40/kg और Grade-A के लिए लगभग ₹120/kg मिलता है।
कच्चा उत्पाद बेचने पर किसान को कीमत का छोटा हिस्सा मिलता है। लेकिन वही उत्पाद अगर पाउडर, तेल, अर्क, पैकेज्ड फल, सूखा फल, कपड़ा या लक्जरी उत्पाद बन जाए तो मूल्य कई गुना बढ़ सकता है। यहीं सरकार की नई योजनाओं का असली फोकस है:
उदाहरण के लिए अरुणाचल कीवी मिशन में 2,000 टन कोल्ड-चेन क्षमता बनाने और 7-10 दिन की मजबूरी वाली बिक्री को खत्म करने का लक्ष्य है।
यही पूरी योजना की सबसे बड़ी परीक्षा है। अगर किसान सिर्फ कच्चा माल बेचता रहा और प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात का मुनाफा निजी कंपनियों के पास चला गया, तो “ग्लोबल ब्रांड” तो बनेगा, लेकिन किसान की आय उतनी नहीं बढ़ेगी।
मेघालय के लाकाडोंग मिशन में ₹175.45 करोड़ से पूरी मूल्य श्रृंखला विकसित करने की योजना है, जबकि असम के Senehjori मिशन में आधुनिक रीलिंग इकाइयां, 30 FPO और डिजिटल ट्रेसबिलिटी जैसे लक्ष्य हैं। त्रिपुरा में ₹236 करोड़ का मिशन एक केंद्रीय हब और आठ संग्रह केंद्रों के जरिए खेत से बाजार तक नेटवर्क बनाने पर केंद्रित है।
अरुणाचल में करीब ₹167 करोड़ का मिशन किसानों को मौजूदा ₹20-120/kg की कीमत से चार से छह गुना बेहतर मूल्य प्राप्ति तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षा रखता है।
पूर्वोत्तर की इन चार उपजों में वैश्विक बाजार की क्षमता जरूर है, लेकिन ब्रांड बनना और किसान अमीर होना दो अलग चीजें हैं। असली सफलता तब होगी जब किसान सिर्फ फसल उगाने वाला नहीं, बल्कि प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और बाजार में हिस्सेदार बने।
अगर ऐसा हुआ तो लाकाडोंग हल्दी सिर्फ हल्दी नहीं, मूगा सिर्फ रेशम नहीं और क्वीन पाइनएप्पल-कीवी सिर्फ फल नहीं रहेंगे। ये पूर्वोत्तर के किसानों की आय बढ़ाने वाले स्थानीय ब्रांड बन सकते हैं।
Updated on:
19 Aug 2026 01:08 pm
Published on:
19 Aug 2026 01:08 pm
