जनसंख्या के आंकड़े सीधे तौर पर विकास से जुड़े हुए हैं। यानी अधिक विकास कम प्रजनन, लेकिन जनसंख्या कम होने के खतरे भी हैं।
डॉ. विवेक एस. अग्रवाल
संचार और शहरी स्वास्थ्य विशेषज्ञ
आमतौर पर किसी भी समस्या के लिए बढ़ती आबादी को दोष दिया जाता है, लेकिन क्या यह वाकई सत्य है? 75 वर्ष के दौरान भारत में औसत प्रति महिला प्रजनन 6.2 से घटकर लगभग 2 रह गया है और अगले 75 वर्षों में यह लगभग 1 शिशु प्रति महिला के स्तर पर आ जाएगा। अगले 25 वर्षों में ही यह 1.30 शिशु प्रति महिला के स्तर पर पहुंच जाएगा। सतही तौर पर तो यह अत्यंत लुभावना प्रतीत होता है। जनसंख्या के आंकड़े सीधे तौर पर विकास से जुड़े हुए हैं। यानी अधिक विकास कम प्रजनन, लेकिन जनसंख्या कम होने के खतरे भी हैं।
बीते वर्षों में प्रजनन व्यवहार का आकलन करने पर भविष्य की आशंकाएं स्पष्ट रूप से रेखांकित होती हैं। बेहतर शिक्षा और जीवनशैली के बीच संतति की ओर ध्यान विलोपित होता जा रहा है। पूर्व में वैवाहिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य संतति माना जाता था, किंतु वर्तमान में आधुनिकता की अंधीदौड़ में इस बाबत दिशाहीनता पसरती जा रही है। संतति या प्रजनन के औचित्य पर ही सवालिया निशान लगने लगे हैं। आमतौर पर करियर के आगे संतान उत्पत्ति कहीं भी प्राथमिकता नहीं रखती और चर्चा में अनेक कुतर्क स्थान लेते हैं।
यह स्पष्ट है कि मानव सभ्यता और जीवन के लिए संतानोत्पत्ति भी उतनी ही आवश्यक है जितनी व्यावसायिक जिंदगी। जीवन संघर्ष में वह उम्र कब निकल जाती है जो संतानोत्पत्ति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है, आज की युवा पीढ़ी समझते हुए नासमझ बन रही है। संतान की उत्पत्ति को मात्र वंश चलाने तक मानना उचित नहीं है। इसका सीधा संबंध मानव सभ्यता से है। संतानोत्पत्ति से जहां समृद्ध युवा पीढ़ी विमुख होती जा रही है, वहीं अल्प आय वर्ग समूह में अब भी प्रजनन दर अधिक ही बनी हुई है। अतिशिक्षित, कार्यशील, उद्यमी, महत्त्वाकांक्षी महिलाओं में बच्चे संभालने का समय एवं कौशल नहीं होना अथवा लालन-पालन में आ रही लागत भी उनको हतोत्साहित करती है। दूसरी ओर अल्प आय वर्ग वर्तमान में भी वंशवृद्धि और ममत्व की लालसा में संतति चाहता है। वैसे यह कितना विरोधाभास है कि जो वहन कर सकता है, उसे वह बच्चे नहीं चाहता और जिस के पास साधनों का अभाव है, वह ज्यादा बच्चे पैदा कर रहा है।
जनसंख्या कम होने के दुष्परिणामों को भी समझना होगा। वर्तमान में विभिन्न प्राणियों की प्रजातियों को बचाए रखने के लिए किए जा रहे यत्नों को मानव प्रजाति पर भविष्य के संकट की दृष्टि से देखना होगा। पूर्व में विभिन्न कारणों यथा शिकार, जलवायु, तापमान बीमारियों के चलते अनेक जीवों की प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर आ गई थी। उस चेतावनी को समझते हुए गोडावण, चीता, आदि के बचाव हेतु सघन प्रयास कर पुन: एक स्तर तक लाया गया है। इसी प्रकार यदि मानव प्रजनन दर 1 या उससे कम स्तर पर आ जाएगी तो शनै: शनै: हमारी प्रजाति भी लुप्त होने के कगार पर आ जाएगी। अत: आवश्यकता है कि एक सार्थक संतुलन कायम हो ताकि जनसंख्या का बोझ भी न बढ़े और मानव विलुप्त भी न हो। पूर्व में सबसे अधिक आबादी वाले देश चीन ने घटती आबादी दर का अहसास करते हुए वर्ष 2015 में 15 वर्षों के लिए जनसंख्या विकास योजना लागू की ताकि 2030 तक प्रजनन दर यानी प्रति महिला जीवनकाल में संतानोत्पत्ति लगभग 2 के लक्ष्य को प्राप्त कर ले। इसी चीन में पहले प्रति महिला 1 से अधिक बच्चे पैदा करने पर रोक थी। इस उल्लेख के पीछे आशय यह है कि जनसंख्या को सदैव बोझ के रूप में नहीं देखना चाहिए।