
ग्वालियर। शहर की सड़कों से धूल हटाकर वायु प्रदूषण कम करने के लिए नगर निगम ने करीब 10 करोड़ रुपए की रोड स्वीपिंग मशीनें खरीदी हैं। इनके संचालन और सड़क सफाई पर हर साल 5 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किया जा रहा है। इसके बावजूद सड़कों पर धूल की समस्या बनी हुई है। निगम के पास मौजूद 11 मशीनों में से फिलहाल सात ही चालू हैं, जबकि चार मशीनें बंद पड़ी हैं। ऐसे में करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी धूल नियंत्रण का असर जमीन पर नजर नहीं आ रहा।
नगर निगम के पास रोड स्वीपिंग के लिए चार छोटी मशीनें हैं, जिनका संचालन निगम कर रहा है। इसके अलावा छह बड़ी मशीनें हैं, लेकिन इनमें से केवल तीन ही चल रही हैं। एक माइक्रो मशीन भी खराब बताई जा रही है। इस तरह कुल 11 मशीनों में चार के बंद रहने से सड़क सफाई का पूरा दबाव सात मशीनों पर है।
ओएनडम और टेंडर में अटकी चार मशीनें
जानकारी के अनुसार नेचर ग्रीन की चार मशीनें भी बंद हैं। इनमें से कुछ मशीनों का ओएनडम होना बाकी है, जबकि मामला टेंडर प्रक्रिया में अटका हुआ बताया जा रहा है। ऐसे समय में जब शहर में धूल और वायु प्रदूषण कम करने के लिए नियमित रोड स्वीपिंग जरूरी है, करोड़ों रुपए की मशीनों का उपयोग नहीं हो पाना व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है।
अपर आयुक्त टी. प्रतीक राव का कहना है कि रोड स्वीपिंग मशीनों से नियमित सफाई कराई जा रही है और रात में भी मशीनें चल रही हैं। जिन मशीनों का टेंडर खत्म हो गया था, उनके लिए प्रक्रिया जारी है।
हर साल 5 करोड़ से ज्यादा खर्च, फिर भी धूल बरकरार
नगर निगम रोड स्वीपिंग और सड़क सफाई पर हर साल 5 करोड़ रुपए से अधिक खर्च कर रहा है। इसके बावजूद शहर की कई सड़कों पर निर्माण सामग्री, टूटी सड़क और किनारों पर जमा मिट्टी धूल की बड़ी वजह बनी हुई है। वाहनों के गुजरने के साथ यह धूल हवा में फैलती है। नियमित सफाई के बावजूद यदि सड़क किनारे जमा मिट्टी नहीं हटती तो धूल का असर बना रहता है।
100 करोड़ से ज्यादा खर्च, फिर भी एक्यूआई पर सवाल
शहर में वायु प्रदूषण कम करने के लिए अलग-अलग मदों में अब तक 100 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए जाने का दावा है। इसके बावजूद वायु गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं होने के सवाल उठ रहे हैं। वायु गुणवत्ता सुधार की जिम्मेदारी लंबे समय से ईई पवन शर्मा सहित पीआइयू की टीम संभाल रही है।
हालिया वायु सर्वेक्षण रिपोर्ट में भी ग्वालियर की रैंकिंग नीचे जाने की बात सामने आई है। ऐसे में एक ओर प्रदूषण नियंत्रण पर करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं, दूसरी ओर रोड स्वीपिंग की चार मशीनें बंद हैं। इससे यह सवाल उठ रहा है कि संसाधनों और बजट के बावजूद धूल नियंत्रण की व्यवस्था जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी है।
11 मशीनों की स्थिति