यह सही है कि न्यायालय और वैधानिक व्यवस्था ने महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा को प्राथमिकता देने का प्रयास किया है, लेकिन कानूनी सुरक्षा के अलावा एक सामाजिक वास्तविकता भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
डॉ. ऋतु सारस्वत, (समाजशास्त्री और स्तंभकार)- लि व टुगेदर, स्प्लिट अप, देन कंप्लेंट'(साथ रहे, अलग हुए और फिर शिकायत दर्ज कर दी) , यह तल्ख टिप्पणी हाल ही देश के सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान सामने आई, जहां एक महिला ने अपने पूर्व साथी के विरुद्ध आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। न्यायालय ने कहा, 'लिव-इन रिलेशनशिप में यही होता है। लोग वर्षों तक साथ रहते हैं और जब उनका संबंध टूटता है, तो महिला पुरुष के विरुद्ध यौन उत्पीडऩ की शिकायत दर्ज कराती है। विवाह के बाहर के संबंधों की यही अनिश्चितताएं और जटिलताएं हैं।
यह पहला मामला नहीं है। देश की विभिन्न अदालतों में ऐसे कई प्रकरण सामने आए हैं, जहां युवा जोड़े साथ रहते हैं, लेकिन संबंध विच्छेद की स्थिति में महिलाएं अपने साथी पर दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाती दिखाई देती हैं। नवंबर 2025 में 'समाधान बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने टिप्पणी की 'किसी संबंध के समाप्त या अप्रिय हो जाने मात्र से उसे दुष्कर्म में परिवर्तित नहीं किया जा सकता।' न्यायालय ने यह भी कहा, 'हर बिगड़े हुए संबंध को दुष्कर्म में बदलना अपराध की गंभीरता कम करता है और आरोपी पर अमिट कलंक व गंभीर अन्याय थोपता है। यह दुरुपयोग गंभीर चिंता का विषय है।
'ये मामले इसलिए भी सामने आ रहे हैं क्योंकि लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा भारतीय मध्यमवर्गीय समाज में स्थापित सामाजिक और वैधानिक मानकों के बीच टकराव पैदा करती है। यह विरोधाभास संवैधानिक वैधता और सामाजिक स्वीकृति के बीच वर्षों से मौजूद है। वर्ष 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने 'एस. खुशबू बनाम कन्नियाम्मल' मामले में स्पष्ट कहा कि दो वयस्क बिना विवाह के साथ रह सकते हैं और इसे अवैध नहीं माना जाएगा। यह निर्णय विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा को ध्यान में रखकर दिया गया था।
अब यह प्रश्न उठता है कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप को वैधानिक मान्यता मिलने से महिलाओं के हित वास्तव में सुरक्षित हुए हैं। यह सही है कि न्यायालय और वैधानिक व्यवस्था ने महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा को प्राथमिकता देने का प्रयास किया है, लेकिन कानूनी सुरक्षा के अलावा एक सामाजिक वास्तविकता भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था आज परंपरा और आधुनिकता के दोराहे पर खड़ी है। युवा पीढ़ी का एक वर्ग स्त्री-मुक्ति विमर्श को विवाह से मुक्ति के रूप में समझता प्रतीत होता है, जबकि स्त्री-मुक्ति का मूल उद्देश्य उत्पीडऩ, असमानता और अन्याय से मुक्ति है।महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जो महिलाएं स्वतंत्रता और स्वायत्तता के आधार पर लिव-इन रिलेशनशिप अपनाती हैं, वे बाद में कई परिस्थितियों में उसी सामाजिक व्यवस्था और परंपरागत मूल्यों का हवाला देते हुए न्यायालय का दरवाजा क्यों खटखटाती हैं? विश्व स्तर पर स्त्री और पुरुष के लिए नैतिक मानदंड समान नहीं हैं।
विवाह को एक रूढिग़त परंपरा मानकर उसकी अस्वीकार्यता जब भी किसी समाज में बढ़ी, उसके दुष्परिणाम समय-समय पर सामने आए हैं। 1934 में मानव विज्ञानी जे.डी. अनविन की पुस्तक 'सेक्स एंड कल्चर' 80 संस्कृतियों और छह सभ्यताओं के अध्ययन पर आधारित है। अनविन ने निष्कर्ष निकाला कि जिन समाजों में विवाह संस्था कमजोर होती है, वहां सामाजिक संरचनाएं भी प्रभावित होती हैं।युवा पीढ़ी के एक वर्ग के लिए अनविन का शोध स्वीकार्य न हो, लेकिन देश की न्यायिक व्यवस्था लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों की बढ़ती संख्या से जूझ रही है। विभिन्न अवसरों पर न्यायालयों ने संकेत दिया है कि लिव-इन रिलेशनशिप को विवाह का विकल्प मानना गंभीर परिणामों को जन्म दे सकता है। अदनान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि विवाह संस्था व्यक्ति को जो सुरक्षा, सामाजिक स्वीकृति, प्रगति और स्थिरता देती है, वह लिव-इन रिलेशनशिप नहीं दे सकती। यह चेतावनी है, जिसे नजरअंदाज करना आने वाले समय में युवा पीढ़ी के लिए घातक हो सकता है।