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ग्वालियर :एमबीबीएस की सीटें बढ़ीं पर डेडबॉडी की कमी… 250 छात्रों पर सिर्फ 5 शव

गजराराजा मेडिकल कॉलेज (जीआरएमसी) में शैक्षणिक विस्तार तो हुआ है, लेकिन बुनियादी व्यावहारिक संसाधनों की कमी ने भविष्य के डॉक्टरों की पढ़ाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कॉलेज में इस सत्र से एमबीबीएस की सीटें 200 से बढ़ाकर 250 कर दी गई हैं। प्रथम वर्ष में दाखिला लेने वाले इन भावी डॉक्टरों के लिए सबसे अहम एनाटॉमी प्रैक्टिकल (मानव शरीर रचना अध्ययन) अब गंभीर संकट में है।
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Oct 15, 2026
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ग्वालियर . गजराराजा मेडिकल कॉलेज (जीआरएमसी) में शैक्षणिक विस्तार तो हुआ है, लेकिन बुनियादी व्यावहारिक संसाधनों की कमी ने भविष्य के डॉक्टरों की पढ़ाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कॉलेज में इस सत्र से एमबीबीएस की सीटें 200 से बढ़ाकर 250 कर दी गई हैं। प्रथम वर्ष में दाखिला लेने वाले इन भावी डॉक्टरों के लिए सबसे अहम एनाटॉमी प्रैक्टिकल (मानव शरीर रचना अध्ययन) अब गंभीर संकट में है। एनाटॉमी विभाग में 250 छात्रों के अनुपात में डिसेक्शन (प्रायोगिक अध्ययन) के लिए कम से कम 10 से 12 शवों की दरकार है, जबकि विभाग के पास इस साल सिर्फ 5 शव ही उपलब्ध हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक टेबल पर दर्जनों छात्रों की भीड़ के बीच छात्र सर्जरी और एनाटॉमी के बारीक हुनर कैसे सीखेंगे ? वहीं विभाग पर पहले से लगभग 15 बॉडी हैं, लेकिन अगर यही हालत रही तो भविष्य में संकट मंडरा सकता है।

श्योपुर मेडिकल कॉलेज का भी सहारा बना जीआरएमसी
जीआरएमसी खुद कैडेवर (शव) संकट से जूझ रहा है, इसके बावजूद प्रशासनिक निर्देशों के तहत यहां से नए स्थापित श्योपुर मेडिकल कॉलेज को भी दो कैडेवर भेजे जा चुके हैं। नए मेडिकल कॉलेजों में बुनियादी ढांचे और देहदान नेटवर्क की कमी का खामियाजा पुराने संस्थानों को भुगतना पड़ रहा है। श्योपुर को बॉडी उपलब्ध कराने के बाद जीआरएमसी के अपने छात्रों के लिए संकट और गहरा गया है।

2024 में जगी थी उम्मीद, अब कम हुई देहदान की रफ्तार
एनाटॅामी विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2024 में कॉलेज को रिकॉर्ड 15 देहदान प्राप्त हुए थे। उस समय ऐसा लगा था कि अंचल में देहदान को लेकर फैली भ्रांतियां दूर हो रही हैं और जागरूकता बढ़ रही है। हालांकि, यह रफ्तार बरकरार नहीं रह सकी। बीते दो वर्षों के दौरान जीआरएमसी को कुल मिलाकर सिर्फ 10 शव ही मिल सके, यानी औसतन प्रति वर्ष 5 शव। सामाजिक जागरूकता में आई इस सुस्ती ने मेडिकल कॉलेज के प्रशासनिक और शैक्षणिक हलकों में बेचैनी बढ़ा दी है।

लावारिस शवों की प्रक्रिया हुई पेचीदा…
विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि पहले लावारिस शवों से मेडिकल कॉलेजों की जरूरत काफी हद तक पूरी हो जाती थी, लेकिन अब कानूनी पेचीदगियों और पुलिस अनापत्ति के कड़े नियमों के चलते लावारिस शव मिलना बेहद सीमित हो गया है। पहले प्रक्रिया सरल थी, लेकिन अब यह काफी जटिल हो चुकी है।

एक टेबल पर रहेंगे 25 छात्र
मेडिकल छात्रों को मानव शरीर की मांसपेशियों, नसों और हड्डियों की वास्तविक समझ देने के लिए एनाटॅामी विभाग में अभी तक 8 टेबल पर छात्रों का अध्ययन होता था, लेकिन अब छात्रों की संख्या बढने पर ये टेबल 8 से बढ़कर 10 हो जाएंगी। इसका मतलब है कि एक टेबल पर करीब 25 छात्र डिसेक्शन करेंगे। इसके साथ ही एमबीबीएस छात्रों के अलावा पीजी की भी सीटें हैं, जिससे यहां अध्ययनरत लगभग 10 पीजी छात्र भी इसी व्यवस्था पर निर्भर हैं। इस लिहाज से छात्रों को शवों की बहुत अधिक आवश्यकता है।

समस्या आ सकती है
एनाटॅामी विभाग को शवों की निरंतर आवश्यकता रहती है। छात्रों की संख्या बढने के साथ अब हर साल 10 से 12 शवों की आवश्यकता है। इसके लिए लोगों को मिलकर प्रयास करना चाहिए। हमारे पास अभी लगभग पुराने 15 शव हैं, जिनके माध्यम से छात्र अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन भविष्य में यही हाल रहा तो समस्या आ सकती है।
डॉ. मनीष चतुर्वेदी, प्रवक्ता, जीआरएमसी

Updated on:
15 Oct 2026 05:45 pm
Published on:
15 Oct 2026 05:44 pm