जैसलमेर के डेडानसर मैदान में गत 6 से 8 मार्च तक आयोजित किए गए तीन दिवसीय चादर महोत्सव कार्यक्रम के लिए एक लाख वर्गफीट क्षेत्रफल वाले मुख्य डोम टेंट के अलावा 50-50 हजार वर्गफीट के 2 डोम स्थापित किए गए और रोजाना 20 हजार से ज्यादा लोगों ने वहां बनी भोजनशाला में सुबह-शाम भोजन किया।
जैसलमेर के डेडानसर मैदान में गत 6 से 8 मार्च तक आयोजित किए गए तीन दिवसीय चादर महोत्सव कार्यक्रम के लिए एक लाख वर्गफीट क्षेत्रफल वाले मुख्य डोम टेंट के अलावा 50-50 हजार वर्गफीट के 2 डोम स्थापित किए गए और रोजाना 20 हजार से ज्यादा लोगों ने वहां बनी भोजनशाला में सुबह-शाम भोजन किया। उक्त आयोजन पूरी तरह से प्लास्टिक मुक्त रखा गया। हजारों की संख्या में लोगों को स्टील के बर्तनों में खाना परोसा गया। जैसलमेर में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर बनाए गए कार्यक्रम स्थल के लिए एक अत्याधुनिक रसोईघर, वातानुकूलित म्यूजियम और लोगों की आवाजाही के लिए ट्रांसपोर्ट व्यवस्था की गई। गौरतलब है कि यह सारा आयोजन दादागुरु जिनदत्त सूरी महाराज के 872 साल पुराने वस्त्रों (चादर) के दर्शन के संबंध में था। आयोजन के पहले दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इसमें शिरकत की और धर्मसभा को सम्बोधित करने के साथ आयोजन के संबंध में जारी विशेष सिक्के और डाक टिकट का भी विमोचन किया।
डेडानसर मैदान में मुख्य कार्यक्रम के लिए जो डोम टेंट लगाया गया, उसमें 12 हजार से अधिक लोगों के बैठने की व्यवस्था रही। साथ ही विशाल मंच बनाया गया। इसी स्थान पर मुख्य सभा, सामूहिक इकतीसा पाठ और भागवत से लेकर जैन संतों के उद्बोधन हुए। इसके अलावा 50-50 हजार फीट के 4 डोम बनाए गए। भोजनशाला में सुबह नाश्ता परोसा गया। जिसमें जैसलमेर की दो पारंपरिक मिठाइयों के साथ इडली सांभर, वड़ा सांभर, पोहा, बाजरे की रोटी और पुड़ी-सब्जी परोसी गई। ऐसे ही दोपहर के भोजन में 3 तरह की मिठाइयां, नमकीन, दाल-चावल और दो प्रकार की सब्जियां परोसी गई। रात्रि भोजन में सूर्यास्त के नियमों का पालन करते हुए शाम का भोजन हल्का रखा गया है। श्रद्धालुओं को दादा गुरुदेव के जीवन से अवगत करवाने के लिए 50 हजार वर्ग फीट के एक एसी डोम में म्यूजियम तैयार किया गया, जहां उनकी जीवनी, जैन परंपराओं, इतिहास और करीब 1000 साल प्राचीन दुर्लभ मूर्तियों का प्रदर्शन किया गया। म्यूजियम में मिट्टी के बर्तन बनाने, वाद्य यंत्र, कशीदाकारी का भी प्रदर्शन किया गया।
कार्यक्रम स्थल पर 50-50 हजार के दो डोम में भोजनशाला संचालित की गई। जिसमें 20 हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने सुबह-शाम का भोजन किया। इसके लिए किसी भी प्रकार के प्लास्टिक डिस्पोजल का इस्तेमाल नहीं किया गया और सभी को स्टील के बर्तनों में भोजन परोसा गया। पानी पीने के लिए भी हर जगह स्टील की गिलासों का ही उपयोग किया गया। खाना बनाने के लिए 600 रसोइयों की टीम जुटी तो अन्य 500 लोगों की टीम ने पूरी भोजन व्यवस्था को सम्भाला।