इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि सभ्यताओं की स्मृतियों को संजोने का माध्यम भी है। इन्हीं स्मृतियों को संरक्षित करने और 500 वर्षों की सांस्कृतिक विरासत को नए सिरे से समझने के उद्देश्य से जीवाजी विश्वविद्यालय का पांच सदस्यीय शोध दल हिमाचल प्रदेश के मंडी क्षेत्र में ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक अध्ययन कर लौटा आया है।

ग्वालियर. इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि सभ्यताओं की स्मृतियों को संजोने का माध्यम भी है। इन्हीं स्मृतियों को संरक्षित करने और 500 वर्षों की सांस्कृतिक विरासत को नए सिरे से समझने के उद्देश्य से जीवाजी विश्वविद्यालय का पांच सदस्यीय शोध दल हिमाचल प्रदेश के मंडी क्षेत्र में ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक अध्ययन कर लौटा आया है। वरिष्ठ इतिहासविद् एवं पुरातत्वविद् डॉ. शांतिदेव सिसोदिया के नेतृत्व में यह अध्ययन सरदार पटेल विश्वविद्यालय के साथ हुए शैक्षणिक समझौता ज्ञापन (एमओयू) के अंतर्गत किया जा रहा है। शोध दल ने मंडी क्षेत्र के त्रिलोकनाथ मंदिर, पंचवक्त्र महादेव मंदिर, भूतनाथ मंदिर, अर्धनारीश्वर मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर तथा महामृत्युंजय मंदिर सहित कई ऐतिहासिक स्थलों का सर्वेक्षण किया। प्रारंभिक अध्ययन में सामने आया है कि क्षेत्र के अधिकांश मंदिर 15वीं और 16वीं शताब्दी में निर्मित हैं तथा इनमें उत्तर भारतीय नागर स्थापत्य शैली की विशिष्ट छाप दिखाई देती है।डॉ. सिसोदिया ने बताया, अध्ययन का मुख्य उद्देश्य केवल मंदिरों की वास्तुकला को समझना नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं, अभिलेखीय साक्ष्यों, स्थानीय टांकरी लिपि और समाज के ऐतिहासिक विकासक्रम को भी दर्ज करना है। शोध दल ने राजमहल परिसर, प्राचीन जल स्रोतों और पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों का भी गहन अध्ययन किया। उनका कहना है कि पश्चिमी हिमालय की सांस्कृतिक निरंतरता को समझने में ये धरोहरें महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती हैं। डॉ. सिसोदिया के अनुसार इस प्रकार के अकादमिक सहयोग न केवल शोध की संभावनाओं को विस्तृत करते हैं, बल्कि विलुप्त होती सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण और उनके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। अध्ययन से प्राप्त तथ्य भविष्य में इतिहास लेखन, शोध प्रकाशनों और विरासत संरक्षण योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण आधार बनेंगे।
नागर शैली की वास्तुकला और प्राचीन मंदिरों का सर्वे
जेयू के शोध दल ने मंडी क्षेत्र के ऐतिहासिक त्रिलोकनाथ मंदिर, पंचवक्त्र महादेव मंदिर, भूतनाथ मंदिर, अर्धनारीश्वर मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर तथा महामृत्युंजय मंदिर सहित कई अति-प्राचीन स्थलों का सघन सर्वेक्षण किया। प्रारंभिक पुरातात्त्विक अध्ययन में यह सामने आया है कि इस क्षेत्र के अधिकांश मंदिर 15वीं और 16वीं शताब्दी (उत्तर मध्यकाल) में निर्मित हैं। इन सभी देवालयों की वास्तुकला पर उत्तर भारतीय नागर स्थापत्य शैली की विशिष्ट छाप दिखाई देती है।
सब मूर्तियों का अलग-अलग महत्व
निरीक्षण में सभी मूर्तियों का डयूमेंटेंशन किया जा रहा है, जिसकी एक रिपोर्ट तैयार की जाएगी। यहां एक शिव मूर्ति मिली है, जिसके पांच मुख है, ये किस संप्रदाय से ताल्लुक रखती है, इसकी भी स्टडी की जा रही है। इसके अन्य मूर्ति का भी इतिहास पता किया जाएगा। यह रिपोर्ट भविष्य में छात्रों के रिचर्स में काम आएगी। इसके अलावा अन्य जगहों को भी चिह्नित किया जा रहा है, जिनका निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
प्रो. शांतिदेव सिसौदिया, वरिष्ठ इतिहासविद् एवं पुरातत्वविद् जीवाजी विश्वविद्यालय