हाईकोर्ट की युगल पीठ ने अनुसूचित जाती, जनजाति निवारण अधिनियम (एट्रोसिटीज एक्ट) के मामले में अहम आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जातिगत दुर्भावना से अपराध किए जाने का ठोस प्रमाण नहीं है, बल्कि विवाद पुराने पैसों के लेन-देन को लेकर था।
हाईकोर्ट की युगल पीठ ने अनुसूचित जाती, जनजाति निवारण अधिनियम (एट्रोसिटीज एक्ट) के मामले में अहम आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जातिगत दुर्भावना से अपराध किए जाने का ठोस प्रमाण नहीं है, बल्कि विवाद पुराने पैसों के लेन-देन को लेकर था। इसलिए एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(2)(1) लागू नहीं होती। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शिकायतकर्ता के अनुसूचित जाति का सदस्य होने के आधार पर अपराध को अत्याचार अधिनियम के तहत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कई बार सडक़ विवाद या पैसों/जमीन के लेन-देन के झगड़े में भी हिंसा हो सकती है, लेकिन ऐसे मामलों में आरोपी को पीडि़त की जाति का ज्ञान तक नहीं होता। ऐसे अपराध जातिगत अपमान नहीं बल्कि व्यक्तिगत विवाद माने जाने चाहिए। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने आपसी समझौते की अर्जी भी पेश की थी। कोर्ट ने दोनों आरोपियों की दोषसिद्धि कायम रखते हुए उनकी जेल में बिताई गई अवधि को पर्याप्त मान लिया और आजीवन कारावास की सजा हटाते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया। दोनों को 20-20 हजार रुपए जुर्माना भरने का निर्देश दिया। यह रकम पीडि़त को मुआवजे के रूप में दी जाएगी। कोर्ट ने इस आदेश को रिपोर्टेवल किया है। दूसरे केसों के लिए भी नजीर बन सकता है।
-कोर्ट ने कहा कि सभी अपराधों को जातिगत आधार पर नहीं देखा जा सकता, बल्कि उनकी प्रकृति और मंशा का बारीकी से मूल्यांकन करना जरूरी है। कुछ अपराध आर्थिक लाभ के लिए किए जाते हैं और कुछ अपराध मानसिक संतुष्टि या जातिगत दुर्भावना से प्रेरित होते हैं। इसी आधार पर अपराध की वास्तविक मंशा को समझना होगा।
- अत्याचार अधिनियम का उद्देश्य अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के सम्मान व अधिकारों की रक्षा करना है। इसलिए धारा 3(2)(1) का उपयोग केवल उन्हीं मामलों में होना चाहिए, जहां आरोपी ने जानबूझकर पीडि़त की जाति के आधार पर अपराध किया हो।
- - कोर्ट ने कहा कि कानून की सही व्याख्या जरूरी है ताकि निजी विवादों को बेवजह जातिगत रंग न दिया जा सके। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ऐसा हुआ तो यह कानून के दुरुपयोग की श्रेणी में आएगा, जिसे अदालत रोकने के लिए बाध्य है।
- हर झगड़े या अपराध को जातिगत अपमान की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, बल्कि यह साबित करना अनिवार्य है कि आरोपी ने पीडि़त को उसकी जाति की वजह से अपमानित करने की नीयत से अपराध किया।
23 मई 2023 को दतिया जिले के गोराघाट थाना क्षेत्र में एक पुराने पैसों के विवाद को लेकर झगड़ा हुआ था। शिकायतकर्ता धर्मेन्द्र वंशकार ने आरोप लगाया कि रात करीब 10 बजे राधे और श्याम केवट उसके घर आए, गाली-गलौज की और जातिसूचक शब्द बोले। राधे ने देशी कट्टे से गोली चलाई जिससे धर्मेन्द्र के सीने के पास चोट आई, वहीं श्याम ने डंडे से हमला कर उसे और उसके पिता को घायल किया। इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर दोनों को गिरफ्तार किया था। विशेष न्यायालय (अत्याचार निवारण अधिनियम), दतिया ने मार्च 2025 में सुनवाई पूरी कर दोनों आरोपियों को धारा 307/34 आईपीसी के तहत पांच-पांच साल की सजा, एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(2)(1) के तहत आजीवन कारावास, और राधे को आम्र्स एक्ट में अतिरिक्त सजा सुनाई थी।