श्योपुर, आधा सैकड़ा से अधिक पुरातात्विक धरोहरों को अपने में समेटे श्योपुर जिले में महज चार राज्य संरक्षित स्मारक है, जिसके चलते जिले की अधिकांश धरोहरों बदहाल हैं या फिर संरक्षण के इंतजार में हैं। बावजूद इसके पुरातत्व विभाग द्वारा इन धरोहरों को संरक्षण तो दूर संरक्षित स्मारकों की सूची में भी शामिल नहीं किया है। यही कारण है कि पुरातत्वप्रेमी कई बार जिले की धरोहरों के संरक्षण की मांग कई बार उठा चुके हैं।
-जिले में कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्मारक होने के बाद भी संरक्षण की दरकार
-पहले 5 राज्य संरक्षित स्मारक थे, लेकिन अब नरसिंह महल डिनोटिफाइ होने से 4 बचे
श्योपुर,
आधा सैकड़ा से अधिक पुरातात्विक धरोहरों को अपने में समेटे श्योपुर जिले में महज चार राज्य संरक्षित स्मारक है, जिसके चलते जिले की अधिकांश धरोहरों बदहाल हैं या फिर संरक्षण के इंतजार में हैं। बावजूद इसके पुरातत्व विभाग द्वारा इन धरोहरों को संरक्षण तो दूर संरक्षित स्मारकों की सूची में भी शामिल नहीं किया है। यही कारण है कि पुरातत्वप्रेमी कई बार जिले की धरोहरों के संरक्षण की मांग कई बार उठा चुके हैं।
चंबल संभाग के तीनों जिलों में पुरातत्व विभाग के 41 राज्य संरक्षित स्मारक हैं, जिनमें श्योपुर जिले में महज 4 ही स्मारक शामिल हैं। जबकि यहां ऐतिहासिक धरोहरों की लंबी फेहरिश्त जो अपने इतिहास और पुरातत्व की स्वयं कहानीं बयां करते हैं। विशेष बात यह है कि चंबल संभाग के मुरैना में 13 और भिंड में 24 स्थल राज्य संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल हैं, लेकिन श्योपुर के महज 4 स्मारक शामिल होना, कहीं न कहीं श्योपुर के साथ भेदभाव जैसी स्थितियां बयां करता है। राज्य संरक्षित स्मारकों की सूची में नहीं होने के कारण जिले की वंचित धरोहरें कहीं तो जमींदौज होने की कगार पर हैं तो कहीं गुमनामी में हैं।
हालांकि पहले जिले में कुल 5 विरासत और धरोहरें राज्य संरक्षित स्मारकों की सूची में थे। किले को पर्यटन विभाग को दिए जाने के चलते इसमें बना नरसिंह महज डिनोटिफाइ हो गया। लिहाजा अब 4 ही राज्य संरक्षित स्मारक श्योपुर जिले में बचे हैं। इनमें श्योपुर किले में स्थिति 18वीं शताब्दी में बनी घुड़साल और 17-18वीं शताब्दी की मनोहरदास की छत्री के साथ ही श्योपुर शहर में स्थित शेरशाह सूरी के सिपहसालार मुनब्बर खां का मकबरा और विजयपुर का किला शामिल हैं। लेकिन विजयपुर का किला भी संरक्षित स्मारक होने के बावजूद भी लगातार खंडहर होता जा रहा है।
जिले में आधा सैकड़ा से अधिक ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक महत्व के आधा सैकड़ा से अधिक स्थल हैं, जिन्हें संरक्षण की दरकार है और अपने आप में अद्वितीय हैं। इनमें ऐतिहासिक डोब कुंड, मानपुर की गढ़ी, ढोढर की गढ़ी, काशीपुरा की गढ़ी, आमेठ का किला, कूनो में पालपुर का किला, बड़ौदा, किला किला, भूरवाड़ा शिवमंदिर, श्योपुर किले में गुरुमहल, कराहल की गढ़ी, बड़ौदा का कुंड, धनायचा जैन मंदिर,नीमोदा मठ, बागल्दा जगन्नाथ जी मंदिर, नीमोदा पीर, भूतेश्वर महादेव मंदिर आदि कई स्मारक शामिल हैं, जो राज्य संरक्षित स्मारकों की सूची के हकदार हैं।
जिले में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए चार साल पहले जिला पुरातत्व एवं पर्यटन परिषद ने भी तीन स्थलों को राज्य संरक्षित स्मारक बनाने के प्रस्ताव भेजे थे। इनमें मानपुर गढ़ी, ढोढर की गढ़ी और भूतेश्वर महादेव मंदिर शामिल हैं। लेकिन तीनों का ही प्रस्ताव अभी अधर में लटका है।