ओपिनियन

उपलब्धियों का ढोल पीटने वाले अभियान!

अभियानों के माध्यम से संबधित तंत्र की सुस्ती टूटती है और नतीजे आने शुरू होते हैं। लेकिन यातायात नियम तोडऩे और अपराधियों की धरपकड़ का जहां तक सवाल है इन्हें किसी अभियान व महानाकाबंदी जैसे प्रयोगों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

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Jun 04, 2026
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उपलब्धियों का ढोल पीटना हो तो सरकारी महकमों के पास अभियान चलाने का अचूक मंत्र रहता है। चाहे अतिक्रमण का मसला हो या फिर यातायात नियमों के उल्लंघन का। इन सबके खिलाफ जब अभियान चलते हैं तो लगता है कि अब बदलाव आएगा। लेकिन संबंधित महकमे अभियान चलाकर ही गहरी नींद में चले जाएं तो लगता है कि मकसद सिर्फ ढोल पीटने का ही था। राजस्थान में सोमवार को पुलिस ने महानाकाबंदी अभियान चलाकर जो कार्रवाई की वह चौंकाने वाली है। महज ७४ हजार वाहनों की इस औचक जांच में जो आंकड़े सामने आए हैं वे बताते हैं कि चाहे अपराधियों की धरपकड़ करनी हो या फिर यातायात नियमों के उल्लंघन की घटनाओं पर अंकुश लगाना हो, सतत अभियान जारी रहे तो पुलिस को बड़ी सफलता हासिल हो सकती है। हर पांचवें वाहन का पुलिस को यातायात नियमों के उल्लंघन पर चालान काटना पड़ा हो तो सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि सड़कों पर चलते-फिरते यमदूतों की संख्या क्यों बढ़ती जा रही है?


चिंताजनक तस्वीर यह भी है कि एक दिन में ही करीब चार सौ लोग नशा करते वाहन चलाते पकड़े गए। जाहिर है नशा कर वाहन चलाने वालों पर सख्ती नहीं हो पाई है। प्रदेश भर में ११०३ जगहों पर नाकाबंदी कर चलाए गए इस अभियान में मिली उपलब्धि पुलिस की तारीफ का विषय हो सकती है। लेकिन सवाल यही है कि अभियान की जरूरत ही क्यों हो? क्या लापरवाह वाहन चालकों को रोज सख्ती का संदेश नहीं देना चाहिए? नाकाबंदी न हो तो क्या अपराधी यों ही घूमते रहेंगे? ये ऐसे सवाल हैं जो आम जनता के मन में हैं। जनता की चिंता उस वक्त और बढ़ जाती है जब राजधानी जयपुर समेत दूसरे मुख्य शहरों में नाकाबंदी के नाम पर वसूली का खेल भी दिखता है। अभियानों के माध्यम से संबधित तंत्र की सुस्ती टूटती है और नतीजे आने शुरू होते हैं। लेकिन यातायात नियम तोडऩे और अपराधियों की धरपकड़ का जहां तक सवाल है इन्हें किसी अभियान व महानाकाबंदी जैसे प्रयोगों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

Published on:
04 Jun 2026 06:29 pm