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अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड: क्या भारत समय रहते सबक ले पाएगा?

आज का भारतीय बच्चा केवल घर की रसोई से प्रभावित नहीं होता। उसके भोजन के विकल्प विज्ञापनों, सोशल मीडिया, डिजिटल प्रभावकारों और त्वरित खाद्य-वितरण मंचों से भी आकार लेते हैं। ऐसे में यदि खाद्य-वातावरण तेजी से बदल रहा है, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति को भी उसी गति से विकसित होना होगा।
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भारत

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Opinion Desk

Jul 21, 2026

PreventiveHealthcare

PreventiveHealthcare

डॉ. मुकेश शर्मा
स्वतंत्र लेखक एवं शिक्षाविद्

सार्वजनिक स्वास्थ्य के इतिहास में सबसे महंगी भूलें तब हुई हैं, जब विज्ञान ने समय रहते चेतावनी दी, लेकिन नीतियां बहुत देर से बनीं। तंबाकू इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। धूम्रपान और कैंसर के बीच संबंधों के वैज्ञानिक संकेत दशकों पहले मिल चुके थे, फिर भी चेतावनी लेबल, विज्ञापन नियंत्रण और कठोर नियमन लागू होने में वर्षों लग गए। इसकी कीमत करोड़ों लोगों ने अपने स्वास्थ्य और जीवन से चुकाई। इसलिए तंबाकू का इतिहास केवल एक उत्पाद का इतिहास नहीं, बल्कि वैज्ञानिक चेतावनियों की अनदेखी की कीमत का इतिहास है। आज प्रश्न यह नहीं है कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड तंबाकू जितना खतरनाक है या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत इस बार वैज्ञानिक संकेतों को समय रहते सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में बदल पाएगा।

बदलती वैश्विक खाद्य-व्यवस्था का प्रतीक अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड
अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड केवल एक नई खाद्य-श्रेणी नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक खाद्य-व्यवस्था का प्रतीक है। सरल भाषा में कहें तो ये वे खाद्य उत्पाद हैं जिन्हें मुख्यत: कारखानों में कई औद्योगिक चरणों से तैयार किया जाता है और जिनमें स्वाद, रंग, बनावट तथा लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए ऐसे अवयव मिलाए जाते हैं जो सामान्य घरेलू रसोई में प्राय: उपयोग नहीं होते। अधिकांश पैकेट वाले नमकीन, मीठे स्नैक्स, शर्करा युक्त शीतल पेय, कई प्रकार के इंस्टैंट नूडल्स, पैकेज्ड बिस्कुट, कैंडी तथा अनेक रेडी-टू-ईट और रेडी-टू-हीट उत्पाद इसके उदाहरण हो सकते हैं। हालांकि प्रत्येक पैकेज्ड खाद्य पदार्थ अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड नहीं होता और न ही प्रत्येक ऐसा उत्पाद समान स्तर का स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न करता है। वास्तविक चिंता इनके बढ़ते और नियमित सेवन को लेकर है, विशेषकर बच्चों और किशोरों में। इसलिए बहस किसी एक उत्पाद के विरोध की नहीं, बल्कि उस बदलते खाद्य-वातावरण की है जो धीरे-धीरे समाज की भोजन संबंधी आदतों को बदल रहा है।

वैज्ञानिक शोधों में वृद्धि
पिछले एक दशक में इस विषय पर वैज्ञानिक शोधों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2024 में प्रकाशित बीएमजे की व्यापक समीक्षा सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों ने अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड के अधिक सेवन और मोटापा, टाइप-2 मधुमेह, हृदय रोग तथा अन्य प्रतिकूल स्वास्थ्य परिणामों के बीच महत्त्वपूर्ण संबंधों की ओर संकेत किया है। यह भी सही है कि अधिकांश उपलब्ध प्रमाण प्रेक्षणात्मक अध्ययनों पर आधारित हैं और उन्हें अंतिम कारण-कार्य संबंध का प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति केवल पूर्ण वैज्ञानिक निश्चितता की प्रतीक्षा नहीं करती। जब अनेक स्वतंत्र अध्ययन लगातार एक ही दिशा में संकेत दें और संभावित सामाजिक लागत बहुत अधिक हो, तब सावधानी का सिद्धांत नीति-निर्माण का आधार बनता है।
इसी सोच के कारण अनेक देशों ने अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड को केवल व्यक्तिगत खान-पान की आदत का विषय नहीं माना। कहीं चेतावनी लेबल लागू किए गए, कहीं बच्चों को लक्षित खाद्य-विज्ञापनों पर नियंत्रण किया गया और कहीं विद्यालयों के खाद्य मानकों को सुदृढ़ किया गया। देशों की नीतियां भिन्न हो सकती हैं, लेकिन उनका साझा संदेश स्पष्ट है,यदि वैज्ञानिक प्रमाण लगातार जोखिम की ओर संकेत कर रहे हों, तो केवल व्यक्ति को सलाह देना पर्याप्त नहीं होता, खाद्य-वातावरण भी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का विषय बन जाता है।

भारत अब वैज्ञानिक और नीतिगत विमर्श का हिस्सा
भारत में भी इस दिशा में प्रारम्भिक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। वर्ष 2024 में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा जारी डाइटरी गाइडलाइंस फॉर इंडियंस में पहली बार अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों तथा अधिक वसा, चीनी और नमक वाले खाद्य पदार्थों के नियमित सेवन को सीमित करने की स्पष्ट सलाह दी गई। साथ ही, खाद्य लेबल पढऩे और न्यूनतम प्रसंस्कृत भोजन को प्राथमिकता देने पर बल दिया गया। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने भी विद्यालयों में सुरक्षित भोजन, जंक फूड की उपलब्धता सीमित करने तथा खाद्य-लेबलिंग को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में अनेक पहल की हैं। यह दर्शाता है कि यह विषय अब भारत के वैज्ञानिक और नीतिगत विमर्श का भी हिस्सा बन चुका है। फिर भी सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। भारत में अभी तक अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड की पहचान, वर्गीकरण और उपभोग के आकलन के लिए पूर्णत: मानकीकृत राष्ट्रीय प्रणाली विकसित नहीं हो सकी है। अलग-अलग अध्ययनों में ‘जंक फूड’, ‘फास्ट फूड’, ‘पैकेज्ड फूड’ और ‘अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड’ जैसे शब्द अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होते हैं। यदि किसी जोखिम का व्यवस्थित और तुलनीय आकलन ही उपलब्ध न हो, तो उसके लिए प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति बनाना कठिन हो जाता है। यह केवल शोध का नहीं, बल्कि नीति-निर्माण का भी महत्त्वपूर्ण अंतर है।

सवाल-क्या हम वैज्ञानिक संकेतों को गंभीरता से ले रहे हैं ?
आज का भारतीय बच्चा केवल घर की रसोई से प्रभावित नहीं होता। उसके भोजन के विकल्प विज्ञापनों, सोशल मीडिया, डिजिटल प्रभावकारों और त्वरित खाद्य-वितरण मंचों से भी आकार लेते हैं। ऐसे में यदि खाद्य-वातावरण तेजी से बदल रहा है, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति को भी उसी गति से विकसित होना होगा। इसका अर्थ किसी खाद्य उत्पाद पर प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं को स्पष्ट जानकारी देना, स्वस्थ विकल्पों को बढ़ावा देना और बच्चों को भ्रामक विपणन से यथासंभव सुरक्षित रखना है।
इस पूरी बहस में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड को तंबाकू के समान घोषित करना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा। तंबाकू का कोई सुरक्षित सेवन स्तर स्वीकार नहीं किया जाता, जबकि भोजन जीवन के लिए अनिवार्य है और सभी प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ समान नहीं होते। इसलिए तुलना उत्पादों की नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया की है। प्रश्न यह नहीं है कि दोनों समान हैं या नहीं, प्रश्न यह है कि क्या हम वैज्ञानिक संकेतों को पर्याप्त गंभीरता से ले रहे हैं।

आवश्यकता विज्ञान आधारित नीति निर्माण की
भारत पहले से ही गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ का सामना कर रहा है। यदि बदलते खाद्य-वातावरण, बच्चों की भोजन संबंधी आदतों और अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड के उपभोग पर विश्वसनीय राष्ट्रीय निगरानी तथा साक्ष्य-आधारित हस्तक्षेप समय रहते विकसित नहीं किए गए, तो भविष्य में उपचार की सामाजिक और आर्थिक लागत कहीं अधिक हो सकती है। इसलिए आवश्यकता भय या अतिशयोक्ति की नहीं, बल्कि अधिक भारतीय शोध, बेहतर निगरानी, स्पष्ट उपभोक्ता सूचना और चरणबद्ध, विज्ञान-आधारित नीति-निर्माण की है।
तंबाकू का इतिहास हमें यह नहीं सिखाता कि हर नई सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती तंबाकू जैसी होगी। वह केवल यह सिखाता है कि वैज्ञानिक चेतावनियों की उपेक्षा महंगी पड़ सकती है। इसलिए आज वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड पर अंतिम वैज्ञानिक निर्णय आ चुका है या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध होते ही विवेकपूर्ण, चरणबद्ध और विज्ञान-आधारित निर्णय लेने का साहस दिखाएगा या फिर एक बार फिर रोकथाम की तुलना में उपचार पर अधिक खर्च करने वाली व्यवस्था का हिस्सा बन जाएगा।