बाबरी विवाद के उस दौर में कवि सम्मेलन भी होना था। कुलिश जी को भनक लगी कि यहां साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश हो सकती है। उन्होंने पहले ही सभी कवियों से मुखातिब होकर कहा कि मेरे शहर के सद्भाव को कोई चोट नहीं पहुंचनी चाहिए।
मुझे सत्तर के दशक की शुरुआत में ही राजस्थान पत्रिका से जुड़ने का मौका मिल गया था, लेकिन सोचा नहीं था कि मुझे लंबे समय तक संपादकीय पेज पर कॉलम लिखने का मौका मिलेगा। कुलिश जी की मंशा थी कि अल्पसंख्यकों, खासतौर से मुस्लिम समुदाय को लेकर लेखन होना चाहिए, जिससे वे सामाजिक रूप से जागरूक हो सकें। वे मुझे खान साहब कहते थे।
उनके कहने पर मैंने कॉलम 'अपने ही घर में' शुरू किया। कॉलम को लिखता मैं था, लेकिन मेरे वालिद हमीद के नाम से प्रकाशित होता था। दस साल तक यह कॉलम चला और मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि कभी यह कॉलम मिस नहीं हुआ।
कुलिश जी सामाजिक सद्भाव के बड़े हितैषी थे। 1992 में वे जयपुर समारोह से जुड़े थे। बाबरी विवाद के उस दौर में कवि सम्मेलन भी होना था। कुलिश जी को भनक लगी कि यहां साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश हो सकती है। उन्होंने कवि सम्मेलन शुरू होने से पहले ही सभी कवियों से मुखातिब होकर कहा कि मेरे शहर के सद्भाव को कोई चोट नहीं पहुंचनी चाहिए। फिर तमाम अटकलों को विराम देते हुए कवि सम्मेलन बेहतर तरीके से हुआ।
मदद के अनूठे तरीके: पत्रिका से जुड़ने के कुछ वक्त बाद ही कुलिश जी के सामाजिक सरोकारों के जुड़े अहम कार्य में शरीक होने का मौका मिला। मशहूर फुटबॉल खिलाड़ी चुन्नी कप्तान की सहायतार्थ कुलिश जी ने बीकानेर में फुटबॉल मैच करवाया था। उस वक्त करीब दस हजार लोगों ने मैच देखा था। चुन्नी कप्तान के उपचार में सहयोग के लिए पचास हजार रुपए एकत्र हुए थे, जो उस वक्त किसी खिलाड़ी को सहयोग के रूप में मिली बड़ी रकम थी। एक बार पत्रिका के एक वरिष्ठ सहयोगी के पुत्र की किडनी फेल हो गई थी। मैं उन्हें लेकर कुलिश जी के पास गया तो उन्होंने तत्काल पचास हजार रुपए निकाल कर दे दिए।
संबंध अपनी जगह, खबर अपनी जगह: पत्रिका में खबरों के जो तेवर रहते हैं, उससे सत्ता में बैठे लोग अक्सर बेचैन रहते हैं। कुलिश जी के सभी मुख्यमंत्रियों से व्यक्तिगत संबंध रहे। एकाध बार तत्कालीन मुख्यमंत्री ने सरकार की खिंचाई करने वाली खबरों को लेकर उलाहना दिया तो कुलिश जी ने सहजता से जवाब दिया- 'हम तो ऐसी खबरों से सरकार के प्रति जन आक्रोश कम करने का काम करते है।' अखबार की ताकत भी यही है कि कभी किसी दबाव में खबरों से समझौता न करे। वे वर्ष 1978 में जयपुर समारोह समिति से सक्रियता से जुड़े थे। वे समारोह को जनता का आयोजन बनाना चाहते थे। इसीलिए सवाई मानसिंह स्टेडियम पर पत्रिका की ओर से आतिशबाजी करवाई। इसके पीछे शोरगरों की कला को प्रोत्साहन देने का भाव भी छिपा था।
सबका रखते पूरा ध्यान: मैं साइकिल से ऑफिस आता था। कवरेज के लिए कुलिश जी ने मुझे बाइक दिलवा दी। वे मुझे प्रदेश के अलग-अलग शहरों में होने वाली रणजी ट्रॉफी के मैच कवर करने भेजते। 1982 में मुम्बई में हॉकी वर्ल्ड कप कवर करने गया तो मेरे ठहरने की सामान्य व्यवस्था की गई। पता चलने पर हॉकी मैच के प्रबंधन से जुड़े मगनसिंह तंवर ने एक बेहतर होटल में व्यवस्था करवा दी। जयपुर लौटा तो पूछने पर मैंने कुलिश जी को सब बता दिया। वे खासे नाराज हुए और संबंधित को भविष्य में सभी संवाददाताओं का ध्यान रखने को कहा। बाबू सा. के बारे में जितना लिखा जाए कम है। शिक्षक, खबरनवीस, संपादक, कवि और लेखक की राहों से गुजरते हुए उन्होंने जो मुकाम हासिल किया, वहां विरले ही पहुंच पाते हैं।
(लेखक खेल पत्रकार के रूप में पत्रिका से लंबे समय तक संबद्ध रहे)