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संपादकीय: सिस्टम की संवेदनहीनता के गड्ढों में दफन जवाबदेही

लापरवाही का कोई एक स्तर हो तो उसकी वजह समझने के प्रयास किए जाएं, यहां तो पूरा सिस्टम ही अपनी लापरवाही और अक्षमता का 'विज्ञापन' करता दिख रहा है।
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Jan 20, 2026
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गुरुग्राम की एक कंपनी में कार्यरत सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की कार कोहरे के कारण नोएडा में निर्माणाधीन मॉल के बेसमेंट की ओर चली गई जहां गड्ढे में 30 फीट पानी भरा था। आखिरी समय तक जिंदा रहने की जद्दोजहद के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। 'पापा… मैं मरना नहीं चाहता, मुझे बचा लो'- आखिरी समय की गुहार अब उसके विवश पिता के कानों में जीवन के अंतिम समय तक गूंजती रहेगी, जिसकी तमाम कोशिशें नाकाम रहीं। पिता ने रात 12:25 बजे 112 पर इसी उम्मीद में फोन किया कि अब तुरंत बचावकर्मी आकर बेटे को सुरक्षित निकाल लेंगे पर, कंट्रोल रूम का रिस्पॉन्स इतना सुस्त था कि बचाव दल 50 मिनट बाद पहुंचा और सुबह चार बजे युवराज की लाश के साथ गड्ढे से बाहर आया।

लापरवाही का कोई एक स्तर हो तो उसकी वजह समझने के प्रयास किए जाएं, यहां तो पूरा सिस्टम ही अपनी लापरवाही और अक्षमता का 'विज्ञापन' करता दिख रहा है। इस दर्दनाक हादसे के लिए प्रारंभिक तौर पर मॉल निर्माता कंपनी के जिम्मेदारों पर कार्रवाई होनी चाहिए, जिन्होंने इतना बड़ा गड्ढ़ा बिना किसी घेरे के छोड़ रखा था। नोएडा विकास प्राधिकरण ने घटना के बाद बैरिकेट जरूर लगवा दिए पर, इसके अधिकारी पहले कहां व्यस्त थे? और अंत में क्विक रिस्पॉन्स टीम का 50 मिनट बाद रिस्पॉन्स? वह भी आधी-अधूरी तैयारी के साथ! बचाव टीम को डूबते युवक की कार तक पहुंचने में दो घंटे से ज्यादा समय लगना भी चकित करता है। कोहरे और ठंड के कारण शुरुआत में बचावकर्मी पानी में उतरने से कतराते रहे। युवराज कार की छत से मोबाइल की रोशनी दिखाकर अपना लोकेशन बताता रहा। यदि रिस्पॉन्स टीम 10 मिनट पहले पहुंचती तो युवराज जिंदा होता।

क्विक रिस्पॉन्स टीम का यह हाल तब है जब कोहरे के कारण लगातार हादसे हो रहे हैं और अकेले रविवार की सुबह ही उत्तर प्रदेश और हरियाणा में 13 लोगों की मौत हो गई। कोहरे के कारण हो रहे हादसों में कार निर्माताओं से भी पूछा जाना चाहिए जो आंखें चौंधियाने वाली हेडलाइट तो जरूर लगा रहे है पर 'एंटी फॉगलाइट' लगे वाहन ही सड़कों पर उतारने की जरूरत नहीं समझ रहे। समाज और प्रशासन की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हम इन घटनाओं को महज 'हादसा' मानकर भूल जाते हैं। चाहे बोरवेल में गिरते बच्चे हों, सीवर गैस से मरते सफाईकर्मी हों या खुले बेसमेंट में डूबती कारें- ये सब मानवीय कमियां हैं, दैवीय आपदाएं नहीं। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी और 'जीरो टॉलरेंस' की नीति नहीं अपनाई जाएगी, तब तक सड़कों पर कोहरे से ज्यादा गहरा अंधेरा हमारे सिस्टम की नीयत में रहेगा। सॉफ्टवेयर इंजीनियर की मौत एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि उस भरोसे की हत्या है जो एक नागरिक अपने देश के कानून और तंत्र पर करता है। यदि अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो लाचार माता-पिता के कानों में गूंजती ये चीखें हमें कभी माफ नहीं करेंगी।

Updated on:
20 Jan 2026 01:03 pm
Published on:
20 Jan 2026 01:03 pm