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अदालती कार्यों में एआइ: नैतिक और नियामक ढांचा जरूरी

वैश्विक स्तर पर भी न्यायालयों में लंबित मामलों और पारदर्शिता सहित परिवादियों को राहत देने के लिए एआइ को कुछ कानूनी कार्यों में आजमाया व अपनाया गया है।

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May 27, 2026
ai in courtroom

डॉ. सचिन बत्रा, (वरिष्ठ पत्रकार व तकनीकी विशेषज्ञ)

हाल ही सुप्रीम कोर्ट ने 'वन केस वन डेट' प्लेटफॉर्म के साथ ही एआइ चैटबॉट 'सु सहाय' लॉन्च किया। बताया गया कि जिला व तहसील स्तर की अदालतों के केस डेटा को एकत्र कर आधुनिक केस मैनेजमेंट सिस्टम बनाया जाएगा। इसमें यह भी कहा गया है कि इससे न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। साथ ही, एआइ चैटबॉट लोगों को अदालती सेवाओं तक पहुंचाने में मददगार साबित होगा। इसकी परिकल्पना भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने पिछले वर्ष दिसंबर में की थी।

अदालतों में तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रवेश
इसका उद्देश्य न्यायपालिका का आधुनिकीकरण करते हुए परिवादियों को राहत देना था। खास बात यह भी थी कि देश में पहली बार चैटजीपीटी का वर्ष 2023 में सतर्कता से उपयोग करने वाले पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस अनूप चितकारा को एआइ समिति में शामिल किया गया। जस्टिस चितकारा ने चैटजीपीटी से एक मामले में सवाल पूछा था कि क्रूरता के ऐसे मामले में अन्य देशों में जमानत मानदंड कैसे निर्धारित होते हैं? उनका यह प्रयास मामले पर राय लेने के लिए नहीं बल्कि वैश्विक कानूनी दृष्टिकोण को समझने का एक प्रयास था। इसी प्रकार न्यायिक आदेशों के भारतीय भाषाओं में एआइ आधारित अनुवाद सेवा 'सुवास' आरंभ की गई, जिससे आम लोगों को सुविधा दी जा सके। इसके अलावा जजों को केस फाइलों का सारांश, पुराने फैसलों की खोज सहित कानूनी शोध में सहायता के लिए 'सुप्रीम कोर्ट पोर्टल फॉर असिस्टेंस इन कोर्ट एफिशिएंसी' यानी 'सुपेस' नामक एआइ टूल से लैस किया गया, जिसे न्यायिक सहायक के रूप में देखा जा रहा है। वैश्विक स्तर पर भी न्यायालयों में लंबित मामलों और पारदर्शिता सहित परिवादियों को राहत देने के लिए एआइ को कुछ कानूनी कार्यों में आजमाया व अपनाया गया है। जैसे कि अमरीका में 'रोबोट लॉयर' के जरिए एआइ आधारित कानूनी तकनीक विकसित हो रही है। वहीं 'हार्वे' एआइ प्लेटफॉर्म दुनिया की बड़ी लॉ फर्मों द्वारा उपयोग किया जा रहा है। जो कि कॉन्ट्रेक्ट ड्राफ्टिंग, लीगल रिसर्च और मुकदमों की तैयारी में मदद के लिए प्रचलित हो चुका है।

नवाचार और जवाबदेही के बीच संतुलन की चुनौती
हालांकि 'डू नॉट पे' नामक 'रोबोट वकील' को पहला यांत्रिक वकील बताया गया था, लेकिन भ्रामक और गलत कानूनी सलाह देने के आरोपों के बाद उसकी जवाबदेही तय न होने पर उसके खिलाफ कार्रवाई की गई। चीन की बात की जाए तो वहां स्मार्ट कोर्ट व इंटरनेट कोर्ट की शुरुआत की गई। सिंगापुर में एआइ आधारित 'ई-कोर्ट' और स्मार्ट रिसर्च सिस्टम विकसित किए हैं। एस्टोनिया में छोटे विवादों या मामलों के तेजी से निस्तारण के लिए 'एआइ जज' का प्रयोग किया गया। लेकिन मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इसकी जवाबदेही पर सवाल उठाए हैं। सवाल हमारे देश में भी उठ चुके हैं, जैसे एआइ की मदद से बनाए गए फर्जी केस, दलीलें, भ्रामक याचिकाएं और वैवाहिक विवादों में पेश किए गए फर्जी सबूत।

यानी अनैतिक और अस्वीकृत उपयोग होने पर संज्ञान लिया गया। लेकिन क्या अदालती कामकाज में एआइ वाकई त्रुटिरहित समाधान है? इस सवाल का जवाब देते हुए यूएनडीपी की रिपोर्ट 'एआइ फॉर जस्टिस' में विशेषज्ञों ने कहा कि एआइ न्याय व्यवस्था को गति देकर अधिक सुलभ बना सकता है, लेकिन इसके लिए मजबूत नैतिक और नियामक ढांचा जरूरी है। इन्हीं चुनौतियों को पिछले वर्ष एआरएक्सआइवी डॉट ओआरजी नामक शोध पत्रिका ने भी रेखांकित किया था। कुल मिलाकर, न्याय के लिए सहायक एआइ कहीं अन्याय का भागीदार न बन जाए, इसे सुनिश्चित करने के लिए दुनिया भर में अदालती कार्यों हेतु एआइ मॉडल को अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ रहा है, जिसमें न्यायाधीश द्वारा नियंत्रित एआइ को सीमित दायरे में स्वीकृति दी जा रही है। ऐसे में माना जा सकता है कि भविष्य में अदालतों की कसौटी पर खरा उतरने के बाद विविध एआइ औजार लंबित मामलों की बड़ी संख्या घटाने के साथ त्वरित न्याय का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।इसके लिए जरूरी होगा कि एआइ विकल्प अदालत को 'मी-लॉर्ड' की तरह आत्मसात करते हुए अनुशासन, ईमानदारी और गोपनीयता के सभी आदेशों पर अमल करने के हुनर के साथ विकसित किए जाएं।

Published on:
27 May 2026 05:20 pm
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