शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता होने पर विद्यार्थियों की पेशेवर नींव कमजोर हो सकती है। संभवतया इस कमजोर नींव के चलते नीटपीजी-2025 में प्रवेश-योग्यता सामान्य के लिए 50 से 7 तथा आरक्षित वर्ग के लिए 40 से शून्य पर्सेंटाइल करनी पड़ी। फलस्वरूप नेगेटिव पर्सेंटाइल वाले विद्यार्थियों को भी पीजी कोर्सों में दाखिला मिल गया।

आर.के. विजय, स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार
नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) ने 23 अप्रेल, 2026 को मेडिकल शिक्षण संस्थानों में एमबीबीएस कोर्स में 150 सीटों और 10 लाख की आबादी पर 100 सीटों की अधिकतम सीमा को हटा दिया है। यानि आधारभूत संरचना के अनुरूप बिना सीमा के सीटें बढ़ाई जा सकेंगी। यह फैसला अधिक विद्यार्थियों के डॉक्टर बनने का सपना साकार करेगा और चिकित्सकों की मांग और आपूर्ति के अंतर को भी कम करेगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या सीटों में बढ़ोतरी के साथ शिक्षा की गुणवत्ता भी सुनिश्चित होगी? सीमित सीट फैकल्टी आदि से संबंधित निर्धारित मानदंडों की घोर अवहेलना की शिकायतें लगातार जारी हैं। सीमा हटने पर बिना ठोस उपायों के इन शिकायतों में वृद्धि ही होगी। मेडिकल शिक्षण संस्थानों के निरीक्षणों में पाई गई अनियमितताएं शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधे सवाल उठाती हैं।
गंभीर आपराधिक कमियां
सरकार ने वर्ष 2017-18 और 2018-19 के लिए क्रमश: 69 और 82 मेडिकल कॉलेजों को कमियों के चलते नए प्रवेश देने से रोक दिया था। वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे एक मामले में भोपाल के एक निजी मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के निरीक्षणों में फर्जी रेकॉर्ड बनाने, फर्जी मरीज भर्ती करने, फर्जी फैकल्टी दर्शाने जैसी गंभीर आपराधिक कमियां पाई गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस कॉलेज को वर्ष 2018-19 व वर्ष 2019-20 के लिए एमबीबीएस में प्रवेश देने से वंचित करने के साथ न्यायालय के साथ धोखाधड़ी के लिए 5 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया था।
ईडी ने की थी छापेमारी
जुलाई, 2025 में राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने बताया था कि पश्चिम बंगाल में शैक्षणिक सत्र 2024-25 और 2025-26 के दौरान क्रमश: 34 और 37 मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी, बुनियादी ढांचे और क्लीनिकल मापदंडों के संबंध में कमियां पाई गईं थीं। राज्य में 41 मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें 26 सरकारी हैं। यानी अधिकांश कॉलेजों में कमियां पाई गईं और इनमें आधे से अधिक सरकारी हैं। सीबीआइ ने जून 2025 में मेडिकल कॉलेजों के निरीक्षण, मान्यता और नवीनीकरण प्रक्रियाओं में निजी संस्थानों को लाभ पहुंचाने की नियत से किए गए कथित घोटाले और व्यापक रिश्वतखोरी के संबंध में एक मामला दर्ज किया था। इसकी जांच में स्वास्थ्य मंत्रालय, एनएमसी और देश के कई निजी मेडिकल कॉलेजों के प्रतिनिधियों के नाम सामने आए थे, जिन पर रिश्वतखोरी, आपराधिक साजिश, गोपनीयता भंग करने और जालसाजी के आरोप थे। इसी मामले में ईडी ने नवंबर में 10 राज्यों में 15 ठिकानों पर छापेमारी की थी।
पेशेवर नींव हो सकती है कमजोर
शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता होने पर विद्यार्थियों की पेशेवर नींव कमजोर हो सकती है। संभवतया इस कमजोर नींव के चलते नीटपीजी-2025 में प्रवेश-योग्यता सामान्य के लिए 50 से 7 तथा आरक्षित वर्ग के लिए 40 से शून्य पर्सेंटाइल करनी पड़ी। फलस्वरूप नेगेटिव पर्सेंटाइल वाले विद्यार्थियों को भी पीजी कोर्सों में दाखिला मिल गया। आम जनता को विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने के लिए ऐसी व्यवस्था में प्रशिक्षित डॉक्टरों की कुशलता का स्तर कैसा होगा, यह भी एक यक्ष प्रश्न है। एमबीबीएस सीटों में असीमित बढ़ोतरी के साथ शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। इस चुनौती के मूल में मेडिकल शिक्षा के घोर व्यावसायीकरण के साथ मेडिकल फैकल्टी की भारी कमी भी है। फैकल्टी मानदंडों की अनुपालना दिखाने के लिए निजी ही नहीं बल्कि सरकारी कॉलेजों को भी अनुचित हथकंडे अपनाने पड़ते हैं।
ठोस उपाय करने चाहिए
सरकार सहित संपूर्ण मेडिकल शिक्षा व्यवस्था को पर्याप्त फैकल्टी की उपलब्धता के लिए ठोस उपाय करने चाहिए। चिकित्सा जैसे संवेदनशील और जीवन रक्षक पेशे (सेवा) के शिक्षण-प्रशिक्षण की गुणवत्ता में कमी का सबसे अधिक खामियाजा आम जनता (उपभोक्ता) को उठाना पड़ता है। साथ ही, इससे विद्यार्थियों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ होता है। इसे सुधारने की पहली जिम्मेदारी शिक्षण संस्थानों, नियामकों और सरकार की है, लेकिन प्रभावित विद्यार्थियों को भी इसमें योगदान देना चाहिए। शिक्षण के स्थापित मानदंडों में हेराफेरी तथा धोखाधड़ी के प्रत्यक्षदर्शी तो स्वयं विद्यार्थी होते हैं, जिन्हें एकजुट होकर इन खामियों को उजागर कर सुधार की मांग करनी चाहिए। एनएमसी और सरकार को ऐसे मामलों में कठोर कारवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।