ओपिनियन

कुलिश जी को पत्रकारिता में हमेशा गुरु माना, उनसे सीखा और सीखता रहा…

खबर में से खबर निकालकर मुद्दे को तार्किक परिणति की ओर ले जाने का कौशल वे जानते थे। इस सबके पीछे उनकी नजर में सिर्फ पाठक रहता था। वे पाठकों का भरोसा किसी कीमत पर तोडऩा नहीं चाहते थे।

2 min read
Mar 20, 2026

ओम थानवी - वरिष्ठ पत्रकार,

मैंने कुलिश जी को पत्रकारिता में हमेशा गुरु माना। गुरु किसे कहते हैं? जिनसे हम सीखते हैं। जो सिखाते हैं, उन्हें हम शिक्षक कहते हैं। मैंने कुलिश जी से सीखा और सीखता रहा। तब भी जब मैं पत्रिका से जनसत्ता में जा चुका था। कुलिश जी में खबर और भाषा, इन दोनों चीजों के तेवर बारीकी से गुंथे हुए थे। कुलिश जी खबर को सूंघ ही नहीं लेते थे, उसकी महत्ता को भांपते हुए खबर में से खबर निकाल कर मुद्दे को तार्किक परिणति की ओर ले जाने का कौशल भी जानते थे। इस सबके पीछे उनकी नजर में सिर्फ पाठक रहता था। वे पाठकों का भरोसा किसी कीमत पर तोडऩा नहीं चाहते थे। लेकिन एक बार तमाम सजगता के बावजूद ऐसा हो गया। यह 1984 की बात है।

जनमानस में पैठ और सत्ता के गलियारों में ऐसा दबदबा कम समाचार पत्रों को हासिल होता है। लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए कमर कस ली गई थी। कमान खुद कुलिश जी संभाले हुए थे। कुछ रिपोर्टरों का मानना था कि कांग्रेस का एक बार पूरे राज्य से सफाया हो सकता है। इसकी जानकारी एक वरिष्ठ साथी कुलिश जी को देने लगे। वे करीबी थे। इस तरह के नियमित 'फीड' से कुलिश जी को भी विश्वास हो चला। कांग्रेस को कोई सीट कहां से मिलेगी? ऐसे सवाल का माहौल केसरगढ़ में बन गया।

इस सवाल का जवाब एक सीट की खबर से मैं लाया। मैंने दौसा का दौरा किया था, जहां राजेश पायलट नाथूसिंह पर भारी पड़ रहे थे। मैं तब पत्रकारिता में अपेक्षया नया था और एक सीट की खबर से वरिष्ठों को अपनी अवधारणा पर पुनर्विचार के लिए नहीं उकसा सकता था। दौसा से जयपुर लौटकर सुबह जब मैं कुलिश जी के कमरे में दाखिल हुआ था तो बेचैन था। माहौल का मुझे पता ही था। मैंने बैठते ही, थोड़े नरम स्वर में कहा, दौसा में मुझे कांग्रेस जीतती लगती है।

कुलिश जी को मानो भरोसा नहीं हुआ। घड़ी भर बाद बोले, पायलट जीतता है तो पायलट का लिखो। मेरी जान में जान आई। रिपोर्ट को पहले पेज पर बॉटम बनाया जाना था। बुजुर्ग शिफ्ट प्रभारी ने मेरी रिपोर्ट पढ़कर कहा- शीर्षक भी तुम्हीं लगा दो, एक रिपोर्ट तो अब तक कांग्रेस के हक में गई नहीं है। मैंने, थोड़ा-सा कौशल बरतते हुए शीर्षक दिया था- 'दौसा में पायलट से लोहा लेना पड़ रहा है नाथूसिंह को'। चुनाव के नतीजे आए तो 25 में से एक भी सीट भाजपा को नहीं मिली।

उस शाम वरिष्ठ संपादक कैलाश मिश्र के साथ मैं चाय के लिए केसरगढ़ से बाहर आया। हम बाहर एक छोटी सी दुकान के सामने बैठकर चाय पीते, गपशप करते थे। अचानक हमने पीछे से कुलिश जी की भारी आवाज सुनी, 'रुको, मैं भी चल रहा हूं।' भारी कदमों से वे हमारे साथ बाहर आए। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। हम हैरान थे। हमने संकोच के साथ अध-मूढ़ों पर बैठ चाय पी। नतीजों पर कुलिश जी कुछ नहीं बोले। न हमारी हिम्मत हुई। कुलिश जी कुछ सोचते रहे और कैलाश मिश्र जैसे नजरों से जमीन में कुछ तलाशते थे।

अगली सुबह हमने-अन्य पाठकों की तरह-पत्रिका में सबसे ऊपर चौंकाने वाला संपादकीय कुलिश जी के नाम से देखा- 'क्षमा'। उन्होंने लिखा था, 'मुझे अतीव खेद है कि मैं मतदाता के मानस को भांपने में पूरी तरह विफल हुआ। मेरे पास कोई सफाई नहीं है और संपूर्ण विनम्रता के साथ मैं पाठकों से क्षमा चाहता हूं।' पत्रकारिता के इतिहास में पेशेवर निर्णय की भूल का ऐसा स्वीकार शायद न मिले। यह जिम्मेदार पत्रकारिता के प्रति कुलिश जी के सरोकार का इजहार ही नहीं था, आने वाली पत्रकारिता के लिए भी सीख-भरा अहम संदेश था।

Updated on:
20 Mar 2026 03:54 pm
Published on:
20 Mar 2026 03:53 pm
Also Read
View All

अगली खबर