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संपादकीय: बच्चों की सेहत के पक्षमें अनुकरणीय पहल

ऐसे में स्कूलों के भीतर और आसपास 'ईट राइट स्कूल' अभियान को सख्ती से लागू करने, खाने-पीने की चीजों के लिए एफएसएसएआइ लाइसेंस अनिवार्य करने और खाद्य सुरक्षा पर्यवेक्षक नियुक्ति के निर्देश अत्यंत व्यावहारिक हैं।
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Aug 01, 2026
junk food
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महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के 1.08 लाख से अधिक स्कूलों और उनके 50 मीटर के दायरे में जंक फूड की बिक्री, मुफ्त वितरण और विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का साहसिक और अनुकरणीय फैसला किया है। यह फैसला बच्चों के स्वस्थ भविष्य की दिशा में उठाया गया आवश्यक कदम कहा जाएगा। समोसा, वड़ा पाव, चिप्स, डीप-फ्राइड स्नैक्स, कोल्ड ड्रिंक्स और चॉकलेट जैसे ज्यादा वसा, चीनी और नमक वाले खाद्य पदार्थों को स्कूलों की सीमा से बाहर करके सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि बच्चों का स्वास्थ्य उसकी प्राथमिकता में है। महाराष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कदम बढ़ाकर अन्य राज्यों के सामने भी नजीर पेश की है। बड़ा सवाल यह है कि देश के अन्य राज्य इस दिशा में कब तत्परता दिखाएंगे? क्योंकि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय पोषण संस्थान ने एक रिपोर्ट जारी कर इस बारे में पहले ही चेतावनी दे दी है। दोनों संस्थानों के अध्ययन में पाया गया कि पिछले 14 साल में देश में जंक फूड की खपत 150 फीसदी बढ़ गई है। इसकी बड़ी वजह बच्चों में इसका बढ़ता आकर्षण है और उसके पीछे जंक फूड की सहज उपलब्धता और बच्चों को लुभाने वाले विज्ञापन हैं।

बचपन की सबसे बड़ी पूंजी अच्छी सेहत होती है, लेकिन आधुनिक जीवनशैली के कारण बच्चों की थाली से पारंपरिक और पौष्टिक भोजन गायब होता जा रहा है। इसका परिणाम कम उम्र में ही बच्चों में बढ़ते मोटापे, बाल-मधुमेह और जीवनशैली से जुड़ी अन्य गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आ रहा है। नीति आयोग और यूनिसेफ जैसी संस्थाओं ने अनुमान जताया है कि यदि बच्चों के आहार पर ध्यान नहीं दिया गया तो 2030 तक देश के 11 फीसदी बच्चे मोटापे और उससे होने वाली बीमारियों के शिकार हो जाएंगे। ऐसे में स्कूलों के भीतर और आसपास 'ईट राइट स्कूल' अभियान को सख्ती से लागू करने, खाने-पीने की चीजों के लिए एफएसएसएआइ लाइसेंस अनिवार्य करने और खाद्य सुरक्षा पर्यवेक्षक नियुक्ति के निर्देश अत्यंत व्यावहारिक हैं।

हालांकि, इस नीति की सफलता कागजी नियमों से ज्यादा धरातल पर इसके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। 50 मीटर के दायरे में रेहड़ी-पटरी वालों और दुकानदारों पर लगातार निगरानी रखना और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती होगी। साथ ही, इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि केवल पाबंदी लगा देना ही काफी नहीं है। बच्चों को स्वस्थ विकल्पों की ओर आकर्षित करना भी उतना ही जरूरी है। जब तक स्कूल कैंटीन में स्वादिष्ट और पौष्टिक विकल्प उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक बच्चों को जंक फूड से पूरी तरह दूर रख पाना कठिन होगा। देश को यदि अपनी युवा आबादी के स्वास्थ्य की रक्षा करनी है तो केंद्र और सभी राज्य सरकारों को मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों में जंक फूड के खिलाफ सख्त नीतियां बनानी होंगी। इसे एक जन-आंदोलन की तरह चलाया जाना चाहिए।

Updated on:
01 Aug 2026 05:39 pm
Published on:
01 Aug 2026 05:39 pm