26 सितंबर 2026,

शनिवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

फिजूल के संदेशों की वजह से बढ़ रहा पर्यावरणीय संकट

उद्योग के अनुमानों के अनुसार भारत से प्रतिदिन लगभग आठ अरब से अधिक ईमेल भेजे जाते हैं, जो सालाना आधार पर लगभग तीन खरब से अधिक ईमेल बैठते हैं।
2 min read
Google source verification

जयपुर

•

image

Opinion Desk

•

image

पंकज चतुर्वेदी

•

Sep 26, 2026

digital clutter

digital clutter

डिजिटल तकनीकों, सस्ते इंटरनेट डेटा और स्मार्टफोन की सर्वसुलभता ने दैनिक जीवन को अत्यधिक सुगम और त्वरित तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही एक गहरा और अदृश्य संकट भी खड़ा कर दिया है जिसे डिजिटल कचरा कहा जाता है। हर दिन हमारे मोबाइल और कंप्यूटर पर आने वाले अनगिनत अनावश्यक ईमेल, वॉट्सऐप पर प्राप्त होने वाले विज्ञापन, व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा भेजे जाने वाले संदेश और विभिन्न क्लाउड सर्वरों पर संग्रहित बेकार का डेटा इस कचरे का निर्माण करते हैं।

प्लास्टिक या इलेक्ट्रॉनिक कचरे की तरह यह डिजिटल कचरा भौतिक रूप से आंखों से दिखाई नहीं देता, इसलिए अधिकांश लोग इसे हानिरहित मान लेते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि यह अदृश्य कचरा हमारे देश के ऊर्जा संसाधनों का भारी व्यय कर रहा है और पर्यावरण पर कार्बन उत्सर्जन का एक गहरा और चिंताजनक बोझ डाल रहा है। भारत में मैसेजिंग और ईमेल का दायरा व्यापक हो चुका है।
उद्योग के अनुमानों के अनुसार भारत से प्रतिदिन लगभग आठ अरब से अधिक ईमेल भेजे जाते हैं, जो सालाना आधार पर लगभग तीन खरब से अधिक ईमेल बैठते हैं। जब कोई संदेश भेजा जाता है, सर्वर पर सहेजा जाता है या किसी नेटवर्क से होकर गुजरता है, तो डेटा सेंटरों, नेटवर्क राउटरों, ऑप्टिकल फाइबर और मोबाइल टावरों को करीब विशाल मात्रा में विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जब हम कोई भारी वीडियो, ऑडियो या उच्च गुणवत्ता वाली छवि बिना सोचे-समझे आगे फॉरवर्ड करते हैं या वर्षों पुराने ईमेल और बैकअप को क्लाउड से डिलीट नहीं करते, तो हम डेटा सेंटरों पर बिजली की खपत और सर्वर को ठंडा रखने में लगने वाली ऊर्जा की मांग को सीधे तौर पर बढ़ा रहे होते हैं। डिजिटल कचरे के कारण होने वाली ऊर्जा की खपत की गंभीरता को समझना आवश्यक है क्योंकि यह सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन से जुड़ा हुआ है।

शोध के अनुसार एक सामान्य स्पैम ईमेल को भेजने, फिल्टर करने, प्रोसेस करने और सर्वर पर स्टोर करने में औसतन 0.3 ग्राम कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन होता है। इस आधार पर यदि भारत में सालाना 1.4 खरब स्पैम ईमेल के आंकड़े को देखा जाए, तो केवल अनचाहे ईमेल के कारण ही हर साल लगभग 4.2 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन होता है। भारत में बिजली उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा कोयले पर निर्भर है, जहां प्रति किलोवाट-घंटा बिजली उत्पादन पर लगभग 0.71 किग्रा कार्बन उत्सर्जन होता है। इस हिसाब से स्पैम ईमेल को प्रोसेस और स्टोर करने में देश की लगभग 4.2 टेरावॉट-अवर बिजली हर साल व्यर्थ चली जाती है। इस समस्या के समाधान के लिए व्यक्तिगत स्तर पर हमें अपनी डिजिटल आदतों में स्वच्छता और अनुशासन अपनाना होगा। सभी अवांछित ईमेल व व्यावसायिक विज्ञापनों को तुरंत अनसब्सक्राइब कर देना चाहिए, ताकि वे बार-बार इनबॉक्स में न आएं। अपने क्लाउड स्टोरेज और ईमेल इनबॉक्स को समय-समय पर साफ करना, पुरानी और डुप्लिकेट फाइलों को डिलीट करना तथा संदेशों को केवल अति-आवश्यकता पडऩे पर ही भेजना एक जिम्मेदार नागरिक की पहचान होनी चाहिए। डिजिटल क्रांति की वास्तविक सफलता तभी है जब हम तकनीक का उपयोग दूरदर्शिता के साथ करें।

वरिष्ठ पत्रकार, एवं पर्यावरणविद्