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संपादकीय: लोकतंत्र में चुनाव आयोग पर भरोसा होना जरूरी

हालांकि चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण है कि मतभेदों के बावजूद सारे फैसले सर्वसम्मति से ही लिए गए, इसलिए यह विवाद निरर्थक है।
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chunav ayog

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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति में पीएम और नेता प्रतिपक्ष के साथ देश के प्रधान न्यायाधीश को शामिल करने का प्रावधान हो या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बीच एक अंग्रेजी अखबार के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते खुलासे ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। करेले पर नीम यह कि नया विवाद सामने आने के एक दिन बाद ही कोलकाता हाईकोर्ट ने भी एक अन्य मामले में आयोग को फटकार लगाई- 'एक बार चुनाव शुरू हो जाते हैं तो आप परेशानियां पैदा करना शुरू कर देते हैं। फिर राजनीतिक दल अदालत आते हैं, जिससे न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है।' हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि 'अधिकारियों को निष्पक्षता से काम करना चाहिए।' दरअसल, चुनाव आयोग ने प. बंगाल में उपचुनावों के लिए आइएसएफ के 'लिफाफा' चुनाव चिह्न को ऋतुब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाली डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस को आवंटित कर दिया। आइएसएफ इसी चुनाव चिह्न पर पिछले दो चुनाव लड़ चुकी है। हाईकोर्ट ने हैरानी जताई कि 'क्या काम करने का यही तरीका है?'

निर्वाचन आयोग के कामकाज का तरीका, जिससे उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, अब धीरे-धीरे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। अखबार के खुलासे में आयोग के दो अन्य सदस्यों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी का मुख्य चुनाव आयुक्त से फैसलों को लेकर मतभेद सामने आया है। यहां तक दावा किया गया है कि आयोग के कुछ फैसलों की जानकारी अन्य चुनाव आयुक्तों को मीडिया से मिली। अब बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या आयोग में सर्वसम्मत फैसलों की परंपरा खत्म हो गई है? और यह भी कि जिन मुद्दों पर आयुक्तों में मतभेद रहे, क्या उन पर फैसले बहुमत से लिए गए? यदि नहीं, तो वे फैसले कानून की कसौटी पर कितने खरे उतरेंगे? हालांकि चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण है कि मतभेदों के बावजूद सारे फैसले सर्वसम्मति से ही लिए गए, इसलिए यह विवाद निरर्थक है। लेकिन आयोग की सफाई तब तक लोगों के गले नहीं उतरेगी, जब तक तीनों चुनाव आयुक्त संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नए खुलासों की हवा न निकाल दें। संयुक्त हस्ताक्षर वाला बयान भी आग पर पानी डालने का काम कर सकता है। आयोग में यदि सब कुछ सही है, तो तीनों चुनाव आयुक्त एक साथ सामने क्यों नहीं आ रहे?

बहरहाल, राजनीतिक दल कमर कसने लगे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों तरफ गोलबंदी शुरू हो गई है। विपक्ष ने तो सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने का आह्वान कर दिया है। कांग्रेस ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं और कॉकरोच जनता पार्टी ने 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। कुछ अन्य दल भी विरोध में सुर मिला रहे हैं। यह विवाद जितनी जल्दी सुलझेगा, लोकतंत्र के लिए उतना ही अच्छा होगा। सबको यह ध्यान रखना चाहिए कि चुनाव की पवित्रता से भरोसा उठना न सत्ता पक्ष के हित में है, न विपक्ष के।