ओपिनियन

क्या एक दूसरे की ‘रेड लाइंस’ को नाप रहे दोनों देश?

अमरीकी शेयर बाजार डॉव जोन्स में 1 प्रतिशत और नैस्डैक में 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई 2.1 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया का कोस्पी 5.4 प्रतिशत तक टूट गया।
4 min read
Jul 10, 2026
america iran
america iran

राहुल लाल, (वरिष्ठ पत्रकारएवं स्तंभकार)

अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान के साथ हुए अंतरिम शांति समझौते को रद्द कर उसे 'पूरी तरह खत्म' घोषित करने से वैश्विक भू-राजनीति और आर्थिक बाजारों में हलचल मच गई है। ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व को 'कू्रर' और 'बीमार' कहा। होर्मुज में वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों और अमरीका-ईरान के बीच बढ़ते सैन्य प्रतिरोध ने दुनिया को गंभीर संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। ट्रंप का इतिहास रहा है कि वे बातचीत की टेबल पर अपनी शर्ते मनवाने के लिए पहले सैन्य और आर्थिक दबाव को चरम पर ले जाते हैं। 'डील तोडऩे' की धमकी देकर सामने वाले पक्ष को कमजोर करने की कोशिश करते हैं। हालांकि, इस बार का संकट केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि ईरान और अमरीका के बीच जमीन पर सीधे सैन्य टकराव हो रहा है। ट्रंप के शांति समझौते से एकपक्षीय पीछे हटने के बाद कच्चे तेल की कीमतें करीब 6 प्रतिशत बढ़कर 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। जबकि ट्रंप के बयान से पूर्व कीमत लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल थी। होर्मुज में जोखिम बढऩे पर जहाजों का प्रीमियम और माल ढुलाई की लागत और बढ़ जाएगी, जिससे तेल आयात करने वाले देशों के लिए कच्चे तेल की लैंडिंग कॉस्ट काफी महंगी हो जाएगी।

शांति वार्ता के तहत ईरान को वैश्विक बाजार में तेल बेचने के लिए जो छूट मिली थी, अमरीका ने उसे तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। इससे बाजार में अचानक से रोजाना लाखों बैरल तेल की कमी होने की आशंका पैदा हो गई है, जो कीमतों को नीचे नहीं आने देगी। यदि ईरान के तेल बुनियादी ढांचे पर हमला होता है, तो कच्चे तेल की कीमतों के और बढऩे की आशंका है। साथ ही, गैस बाजार पर भी असर पड़ा है। यूरोप में गैस की कीमतों में ५ फीसदी से अधिक की तेजी आ गई है और फारस की खाड़ी से होने वाले एलएनजी परिवहन पर सुरक्षा जोखिम बढ़ गया है। अमरीकी शेयर बाजार डॉव जोन्स में 1 प्रतिशत और नैस्डैक में 1.1 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई 2.1 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया का कोस्पी 5.4 प्रतिशत तक टूट गया।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए नकारात्मक है, जिससे भारतीय शेयर बाजारों पर भी दबाव साफ दिख रहा है। महंगाई बढऩे के डर से केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में कटौती का फैसला टाल सकते हैं, या फिर दरों को और बढ़ा सकते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह केवल दबाव बनाने की रणनीति है या दुनिया क्षेत्रीय युद्ध की ओर बढ़ रही है? ट्रंप की विदेश नीति का इतिहास गवाह है कि वे 'आर्ट ऑफ द डील' के तहत काम करते हैं। इस रणनीति का मुख्य स्तंभ है- किसी अंतिम और बड़ी डील से पहले तनाव को चरम सीमा तक ले जाना। वे अक्सर समझौते तोड़ते हैं, प्रतिबंधों की झड़ी लगाते हैं और सैन्य कार्रवाई की धमकी देते हैं ताकि सामने वाले पक्ष को मनोवैज्ञानिक रूप से पूरी तरह झुकाया जा सके। इस बार भी उन्होंने समझौते को 'पूरी तरह खत्म' घोषित करने के साथ ही अपने दो मुख्य दूतों को पर्दे के पीछे सक्रिय रखा है। ट्रंप ने गेंद ईरान के पाले में डालते हुए कहा है कि बातचीत की मेज पर लौटने की जिम्मेदारी अब तेहरान की है। तमाम आक्रामक बयानों, अमरीकी एयरस्ट्राइक और ईरान द्वारा कुवैत व बहरीन में अमरीकी ठिकानों पर दागे गए 85 रॉकेटों के बावजूद, वर्तमान परिदृश्य में 'वार्ता' (नियंत्रित कूटनीति) का पलड़ा अभी भी पूर्ण युद्ध की तुलना में भारी है। इसके पीछे दोनों पक्षों की कोई आपसी सद्भावना नहीं, बल्कि 'परस्पर सुनिश्चित विनाश' का वास्तविक डर है। अमरीका जानता है कि मध्य पूर्व का एक और पूर्ण युद्ध उसे एक अंतहीन दलदल में धकेल देगा (जैसा कि इराक और अफगानिस्तान में हुआ था)।

कच्चे तेल के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से खुद अमरीका के भीतर घरेलू महंगाई भड़केगी, जो राजनीतिक रूप से ट्रंप की घरेलू लोकप्रियता और आर्थिक नीतियों के लिए आत्मघाती साबित होगी। साथ ही, अमरीका यूक्रेन-रूस और ताइवान के तनावों के बीच एक तीसरा बड़ा सैन्य मोर्चा खोलने से बचना चाहता है। वहीं ईरान को पता है कि अमरीका के सामने सीधे युद्ध में उतरने का मतलब उसके पूरे बुनियादी ढांचे और तेल रिफाइनरियों का तबाह हो जाना होगा, इसलिए ईरान के हमले 'प्रतीकात्मक' और 'सीमित' हैं, जो केवल उसकी घरेलू साख बचाने के लिए हैं। पर्दे के पीछे से वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियां पूर्ण युद्ध को रोकने के लिए अत्यधिक सक्रिय हैं। कतर, ओमान और तुर्किये जैसे देश दोनों पक्षों के बीच गुप्त संदेशों के आदान-प्रदान का माध्यम बने हुए हैं।

वैश्विक समुदाय (विशेषकर यूरोपीय देश और चीन, जो तेल के बड़े उपभोक्ता हैं) दोनों पक्षों पर तनाव कम करने का भारी कूटनीतिक दबाव बना रहे हैं। वर्तमान स्थिति शुद्ध रूप से 'ब्रिंकमैनशिप' अर्थात युद्ध के कगार तक जाकर अपनी शर्तें मनवाने की नीति की है। दोनों देश युद्ध की अंतिम सीमा पर खड़े होकर एक-दूसरे की बर्दाश्त करने की क्षमता और 'रेड लाइंस' को नाप रहे हैं। चूंकि एक पूर्ण सैन्य टकराव का हर्जाना वाशिंगटन और तेहरान दोनों के लिए असहनीय है, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि आने वाले हफ्तों में बेहद सख्त, नई और कड़े सुरक्षा प्रतिबंधों की शर्तों के साथ दोनों देश फिर से वार्ता की मेज पर लौटेंगे। तब तक वैश्विक बाजारों को इस नियंत्रित तनाव, अनिश्चितता और उतार-चढ़ाव के साए में ही जीना होगा। अगले कुछ दिन तय करेंगे कि ट्रंप की यह 'धमकी' एक नई वैश्विक कूटनीति की शुरुआत करती है या फिर दुनिया को पुन: विनाशकारी आर्थिक संकट की ओर धकेलती है।

Updated on:
10 Jul 2026 04:53 pm
Published on:
10 Jul 2026 04:53 pm