
पंकज तिवारी
कवि, चित्रकार एवं कला समीक्षक
आज जबकि हजारों खर्च करके लोग सिनेमा देखने जाते हैं। सिनेमा में खुद को ढूंढने का प्रयास करते हैं। वर्ष में कम से कम एक बार कहीं भी घूमने का प्लान करते हैं और परिवार के साथ आनंद की खोज में लगे रहते हैं, वहीं कला के प्रति उन सभी में व्याप्त उदासीनता से मन विचलित हो उठता है। कला के प्रति अधिकतर के मन में वो मोह-माया नहीं दिखती जो दिखनी चाहिए। च्पेंटिंग तो मेरे समझ में ही नहीं आतीज्, कहकर खुद का पीछा छुड़वा लेना आम हो गया है। जबकि देखा जाए तो बचपन से ही अमूर्त ही सही, कला सभी के साथ होती है। बच्चा जब लिखना भी नहीं जानता तभी से कृतियां बनाने लगता है। क्या ऐसा कोई है जो आड़ी-तिरछी रेखाओं के बिना सीधे लिखना-पढऩा शुरू कर दिया हो। बच्चे जहां भी मौका पाते हैं कुछ न कुछ जरूर बनाने लग जाते हैं फिर चाहे दीवार हो, जमीन हो या कोई भी धरातल। हां, ये बात अलग है कि देखने वालों को समझ आए या नहीं।
आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादलों के बदलते तमाम रूपों से कौन परिचित नहीं होगा? अनजाने ही सही हमारी आंखों के सामने बनी किसी भी आकृति को हम किसी न किसी रूप में जोडकऱ देखने लग जाते हैं जो पहले तो अमूर्त नजर आती है पर थोड़ी ही देर में मूर्त रूप अख्तियार कर लेती है और हमारे दिलों दिमाग पर छा जाती है। कहने का मकसद बस इतना है कि किसी भी वस्तु, लोग या स्थान को समझने हेतु समय देना पड़ता है तब जाकर उसके बारे में जानकारी और उसकी विशेषता से परिचित होने का सौभाग्य नसीब हो पाता है फिर कला को लेकर ऐसा अन्यायपूर्ण रवैया क्यूं? क्यूं हममें से अधिकतर तो गैलरियों में जाते ही नहीं और यदि भूलवश कोई पहुंच भी गया तो ऐसा महसूस करता है जैसे हमने बहुत बड़ा अन्याय कर दिया हो। क्या हम अपने परिवार के साथ कला दीर्घा में पहुंच कर कृतियों पर घंटों चर्चा नहीं कर सकते? क्या अपने बच्चों को कला, कलाकार एवं कला दीर्घाओं से परिचित नहीं करा सकते। विदेशों में कला एवं कलाकारों के प्रति ऐसी दीवानगी है कि लोग महीनों पहले से ही प्रर्दशनी में जाने की तैयारी करने लग जाते हैं। कलाकारों का सम्मान इतना कि उन्हें विशेष कार्यक्रमों में विशिष्टता की भूमिका में निमंत्रित करते हैं। कृतियों पर घंटों चर्चा करते हैं। कलाकारों के साथ फोटो खिंचवा कर खुद पर गर्व करते हैं। दीर्घाओं में प्रवेश हेतु बाकायदा टिकट भी खरीदते हैं। अपने यहां शायद ही किसी कला दीर्घा में टिकट लगता हो बावजूद इसके बड़ी से बड़ी दीर्घाओं में, बड़े से बड़े कलाकारों के प्रर्दशनी में भी अंगुलियों पर गिनने वाली संख्या होती है। कला को लेकर भारतीय जन में इतनी उदासीनता है कि कलाकार जो सिर्फ और सिर्फ कलाकृतियां बेचकर जीवन यापन कर रहा है, को जीवन बड़ी जद्दोजहद के साथ गुजारनी पड़ती है। लोग अपने घरों को सजाने में लाखों खर्च कर देते हैं पर किसी दीर्घा में जाकर कोई खूबसूरत सी कलाकृति खरीद कर घर में नहीं लगाते, कलाकार और कलाकृति उनको किसी तीसरी दुनिया से संबंधित नजर आते हैं। लोगों के मन में ये बात घर कर गई होती है कि कलाकृतियां लाखों में बिकती हैं कौन खरीद पाएगा, मेरे बस की बात तो नहीं है। ऐसे भ्रम का असर ये होता है कि लोग कलाकृतियों के नजदीक ही नहीं जाना चाहते जबकि सच्चाई ये है कि सभी कलाकृतियां लाखों में नहीं होती। अधिकतर कलाकृतियां हमारे बजट में भी होती हैं। कलाकारों के पास हर तरह के कार्य होते हैं।
हमें, मतलब हर भारतीय को मौका ढूंढकर कृतियों और कलाकारों के समीप जाना होगा, समझना होगा उनके दुनिया को और बढ़ावा देना होगा उनके सृजन को। कलाकारों को उत्साहित करना होगा कि वो हमेशा कुछ न कुछ नया सृजन करें। पुराने कलाकारों की कृतियां तो अरबों में बिकती ही हैं जिसका जीता जागता उदाहरण अभी राजा रवि वर्मा की पेंटिंग यशोदा व कृष्ण है, जो 167.20 करोड़ में बिकी पर नए कलाकारों पर ध्यान कौन देगा?