
हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने 'शाहीन मलिक बनाम भारत संघ' मामले की सुनवाई के दौरान तेजाब हमलों की रोकथाम और पीडि़तों के पुनर्वास को लेकर केंद्र सरकार पर कठोर टिप्पणी की। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि आपके दिशा-निर्देशों के बावजूद दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हो रही हैं। वास्तव में, ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। इसका अर्थ है कि कहीं कुछ गलत है। आपके दिशा-निर्देश उस उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाए हैं, जिसके लिए उन्हें बनाया गया था। यही उन्हें लेकर पुनर्विचार करने का पर्याप्त कारण है। न्यायालय ने आगे कहा, 'केवल दिशा-निर्देश जारी कर देना इस समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही व दिशा-निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन महत्वपूर्ण होगा।' मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा, 'आप केवल इस बात से संतुष्ट होकर नहीं बैठ सकते कि दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं और जिम्मेदारी राज्यों पर डाल दी गई है।'
उल्लेखनीय है कि 'शाहीन मलिक बनाम भारत संघ' मामले में सर्वोच्च न्यायालय तेजाब हमलों की रोकथाम के साथ-साथ पीडि़तों के उपचार और पुनर्वास से जुड़े प्रश्नों पर सुनवाई कर रहा है। इसी दौरान अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने वर्ष 2016 में अपने पुरुष सहकर्मी के तेजाब हमले का शिकार हुई गुवाहाटी उच्च न्यायालय की अधिवक्ता निशामोनी बोरा का मामला उठाया। एक आंख की दृष्टि गंभीर रूप से प्रभावित होने के बावजूद वकालत जारी रखने वाली बोरा का प्रसंग इस बात को रेखांकित करता है कि तेजाब हमले के पीडि़तों का संघर्ष केवल चिकित्सा उपचार तक सीमित नहीं होता, उनके लिए अपने पेशेवर जीवन, आत्मनिर्भरता और गरिमा को बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है। भारत में तेजाब हमलों की गंभीरता को समझने के लिए इनके दर्ज मामलों के आंकड़ों पर भी नजर डालना आवश्यक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015 से 2024 के बीच देश में महिलाओं पर तेजाब हमले के 1,291 मामले दर्ज किए गए। यह आंकड़ा केवल दर्ज मामलों को दर्शाता है।
सामाजिक दबाव, भय, कानूनी प्रक्रिया की जटिलताओं अथवा अन्य कारणों से कुछ घटनाएं दर्ज नहीं हो पातीं इसलिए वास्तविक संख्या इससे अधिक होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। तेजाब हमला स्त्री के प्रति हिंसक व्यवहार का एक क्रूरतम रूप ही नहीं, बल्कि उस सामाजिक नैतिकता को भी चुनौती देने वाली घटना है, जिसमें स्त्री की इच्छा, उसकी असहमति और उसके निर्णय को स्वीकार करने के बजाय उन्हें पुरुष के अधिकारबोध के विरुद्ध देखा जाता है। इस सत्य से कदापि इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्नति के तमाम दावों और स्त्री सशक्तीकरण के निरंतर प्रयासों के बावजूद आज भी स्त्री का 'ना' कहना अथवा उसकी असहमति पुरुष के अहंकार को ठेस पहुंचाती है और कई बार इसी की परिणति तेजाब हमले जैसी वीभत्स हिंसा के रूप में होती है। तेजाब हमले का प्रभाव स्त्री के शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके मन, आत्मबोध और सामाजिक अस्तित्व को भी गहरे स्तर पर प्रभावित करता है।चेहरे और शरीर पर स्थायी घावों के साथ उसे अपनी बदली हुई शारीरिक छवि को स्वीकार करने, आत्मविश्वास पुन: अर्जित करने व सामान्य सामाजिक जीवन में लौटने की कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। स्थिति तब और जटिल हो जाती है, जब समाज उसकी पीड़ा के प्रति संवेदनशील होने के बजाय उसके बाहरी स्वरूप के आधार पर उसके व्यक्तित्व और जीवन की संभावनाओं का मूल्यांकन करने लगता है।
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व के विभिन्न देशों में महिलाएं तेजाब हमलों की शिकार होती रही हैं। इस हिंसा के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों को समझने के लिए वर्ष 2023 में प्रकाशित समीक्षा 'ए मेडिकल-लीगल एंड साइकोलॉजिकल सिस्टेमैटिक रिव्यू ऑन विट्रिओलेज रिलेटेड टू जेंडर-बेस्ड वायलेंस' में दुनियाभर में तेजाब हमलों की शिकार महिलाओं पर किए गए शोधों का विश्लेषण किया गया। इस समीक्षा में सामने आया कि शारीरिक क्षति के अतिरिक्त सामाजिक अलगाव और बहिष्करण भी पीडि़ताओं के जीवन को गहराई से प्रभावित करते हैं। 'माय फेस हैड मेल्टेड इंटू माय नेक लाइक कैंडल वैक्स '(मेरा चेहरा मोमबत्ती के मोम की तरह पिघलकर मेरी गर्दन में मिल गया था।)' ये शब्द ब्रिटेन की केटी पाइपर के हैं। 250 से अधिक ऑपरेशनों की लंबी और असहनीय पीड़ा से गुजरने के बाद केटी पाइपर ने जिस साहस के साथ अपने अनुभवों को आत्मकथा 'ब्यूटीफुल' में अभिव्यक्त किया, वह हमें भीतर तक विचलित करता है।
उनकी पीड़ा केवल एक स्त्री की निजी त्रासदी नहीं, बल्कि उस समाज के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्न है, जो स्वयं को सभ्य और प्रगतिशील होने का दावा करता है। दुनियाभर में हजारों महिलाएं तेजाब हमलों की ऐसी ही अमानवीय हिंसा का सामना कर चुकी हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या स्त्री की स्वतंत्र इच्छा और असहमति के उत्तर में उसके चेहरे, शरीर और पूरे जीवन को नष्ट कर देना भी उसी सभ्यता का हिस्सा है, जिस पर हम गर्व करते हैं? यदि हमारी सामाजिक व्यवस्था स्त्री को इस क्रूर हिंसा से सुरक्षित नहीं रख सकती, तो सभ्यता और स्त्री सशक्तीकरण के हमारे दावे कितने सार्थक हैं? यह स्थिति केंद्र सरकार और राज्य सरकारों, दोनों से ठोस कार्रवाई की अपेक्षा करती है। तेजाब की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण, नियमों का कठोर क्रियान्वयन, दोषियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई और पीडि़ताओं के दीर्घकालिक पुनर्वास को प्राथमिकता देना अब टाला नहीं जा सकता।
डॉ. ऋतु सारस्वत, (समाजशास्त्री एवं स्तंभकार)