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संपादकीय: पाक को आतंक पर दोहरी नीति में करना होगा बदलाव

बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, फिर भी वहां विकास की बजाय सैन्यीकरण और दमन की अलग ही कहानी रही है। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस क्षेत्र में स्थानीय आकांक्षाओं को पाकिस्तान के हुक्मरानों ने लगातार नजरअंदाज किया, जिससे असंतोष व विद्रोह की आग को बढ़ावा मिला। बलोच लिबरेशन आर्मी जैसे अलगाववादी समूहों की गतिविधियां भी इसी असंतोष की भावना से उपजी हैं।
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May 25, 2026
balochistan situation

पाकिस्तान के क्वेटा में रेलवे ट्रैक पर हुए भीषण धमाके में दो दर्जन से अधिक लोगों की जान चली गई और कई घायल हो गए। रेलवे ट्रैक से गुजर रही ट्रेन को निशाना बनाकर यह आत्मघाती हमला किया गया था। बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। हिंसा चाहे किसी भी रूप में हो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन क्वेटा में हुए इस धमाके के उस पहलू पर भी गौर करना होगा जिसमें पाकिस्तान ने लगातार अपनी घरेलू समस्याओं की अनदेखी करते हुए स्वतंत्रता की मांग कर रहे बलूचिस्तान के लोगों के अधिकारों को कुचलने का काम किया।
यह तथ्य जगजाहिर है कि पाकिस्तान लंबे समय से आतंकियों का पोषण कर उनका भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता रहा है। एक तरह से ऐसा कर वह भारत के खिलाफ छद्म युद्ध करने में लगातार जुटा रहता हैै। इसके उलट वह अपनी अंदरूनी समस्याओं को नजरअंदाज करता रहा है। यही वजह है कि वह आज चौतरफा अराजकता के वातावरण से घिरा हुआ है।  बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, फिर भी वहां विकास की बजाय सैन्यीकरण और दमन की अलग ही कहानी रही है। प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस क्षेत्र में स्थानीय आकांक्षाओं को पाकिस्तान के हुक्मरानों ने लगातार नजरअंदाज किया, जिससे असंतोष व विद्रोह की आग को बढ़ावा मिला। बलोच लिबरेशन आर्मी जैसे अलगाववादी समूहों की गतिविधियां भी इसी असंतोष की भावना से उपजी हैं। दुनिया को अब यह सोचना चाहिए कि पाकिस्तान में ऐसी स्थिति क्यों बनी हुई है। क्यों हर कुछ महीनों में वहां बड़े हमले होते रहते हैं? इसका जवाब इसकी नीतियों में छिपा है, जिसमें आतंक को ‘अच्छा’ और ‘बुरा’ में बांटने की गलत सोच, पड़ोसी देशों के खिलाफ छद्म युद्ध की रणनीति और आंतरिक असंतोष को दबाने का बर्बर तरीका जिम्मेदार है। वस्तुत: भारत में सीमा पार से आने वाले आतंकियों को खाद-पानी मुहैया कराने में लगे रहे पाकिस्तान ने कभी बलूचिस्तान में नागरिक अधिकारों की मांग कर रहे लोगों की चिंता की ही नहीं। बलूच खुद को स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं तो पाकिस्तान इन्हें आतंकी करार देता है। पाकिस्तान को समझना होगा कि यह हिंसा कोई बाहरी ताकत नहीं, बल्कि उसकी अपनी नीतियों का परिणाम है। उसे दोहरी नीति छोडऩी होगी।
अपने ही प्रांतों में अलगाव की स्थितियां बनने का राजनीतिक समाधान तलाशे बिना ऐसे संकट से पार पाना आसान नहीं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहिए कि वह बयानबाजी से ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से खुद को आतंकवाद विरोधी बताए। बलूच अलगाववादियों को भी समझना होगा कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। बहरहाल शांति की राह के लिए इस्लामाबाद को जवाबदेही, समावेशी विकास और प्रांतों की सच्ची भागीदारी का रास्ता अपनाना होगा।

Updated on:
25 May 2026 06:10 pm
Published on:
25 May 2026 06:10 pm